Saturday, 15 August 2020

स्वतंत्रता आंदोलनों में बब्याल और बीहटा के लोगों ने निभाई अहम भूमिका, असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ों तक में हुए शामिल

जिले के 334 लोग आंदोलनों में प्रमुख रूप से रहे सक्रिय, इनमें 164 शहरी व 170 ग्रामीण थे 

रवि प्रताप सिंह। अम्बाला 

आजादी की लड़ाई में ग्रामीणों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इन्हें इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला जिसके वो अधिकारी थे। इसी कड़ी में बब्याल और बीहटा गांव के लोगों ने सभी राष्ट्रीय आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई। इनके अलावा  शदजादपूर, पतरेहड़ी, पंजोखरा साहिब, केसरी और साहा लोगों ने भी आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर भाग लिया। उल्लेखनीय है कि जिले के 334 लोगों ने आजादी की लड़ाई में प्रमुख रूप से भाग लिया। इसमें 164 शहरी थे वहीं 170 गांवों  से ताल्लुक रखते थे।

सिटी में गांधी जी ने 50 हजार को लोगो किया संबोधित

इतिहासकार यूवी सिंह ने बताया कि बब्याल छावनी के नजदीक होने के चलते यहां राष्ट्रीय घटनाओं का प्रभाव जल्द पढ़ता था। जलियांवाला बाग नरसंहार और रोलेट एक्ट जैसे कानूनों के विरोध में महात्मा गांधी ने वर्ष 1920 को असहयोग आंदोलन चलाया। आंदोलन को गति देने के लिए गांधी जी ने मार्च, 1921 में अम्बाला शहर में एक विशाल जन सभा को संबोधित किया। इसमें अम्बाला समेत आस-पास से करीब 50 हजार लोग शामिल हुए। सभा में शामिल होने वाले अधिकतर लोग ग्रामीण थे। इस सभा में बब्याल से रामचंद्र जिंदल, आत्मा राम और ब्रम्हानंद गौतम शामिल हुए। वैसे, अकेले बब्याल से  सभी राष्ट्रीय आंदोलन में प्रमुख रूप से 12 लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें आत्मा राम, राम चंद्र जिंदल, बैधनाथ जिंदल, दीलीप सिंह, हजारी लाल, मेहर चंद्र परशुराम, रूप चंद्र, साधु राम, केदारनाथ शर्मा, मातु राम और ब्रम्हानंद शामिल हैं।  इन्हें कई बार 6 महीने से एक साल तक की जेल भी हुई थी। 


राम चंद्र ने आजीवन खादी पहनने का प्रण लिया 

गांधी जी के आह्वान पर रामचंद्र ने अन्य सहयोगियों की मदद से नमक कानून तोड़ा। साथ ही विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। 8 अगस्त,1930 को बब्याल के शराब व्यापारी की दुकान के सामने रामचंद्र और आलाराम के नेतृत्व में 400 स्त्री और पुरुष ने प्रदर्शन किया। धरने के सामने झुकते हुए व्यापारी को अपनी दुकान बंद करनी पड़ी। इसके अलावा  बब्याल में अछुत्तोदार कमेटी बनाई गई। इसमें आत्माराम व राम चंद्र जिंदल ने मुख्य भूमिका निभाई। राम चंद्र ने आजीवन स्वदेशी मंत्र अपनाते हुए खादी पहनने का प्रण लिया। खादी के प्रचार व प्रसार के लिए खद्दर प्रचार युवक संघ भी बनाया गया। इस तरह बब्याल आजादी की लड़ाई  लड़ने का गढ़ बन चुका था। इसी कड़ी में स्वतंत्रता सेनानी राधेश्याम शर्मा और सूरज प्रकाश ने 9 अक्टुबर, 1930 को बब्याल पहुंचकर भूमि कर न देने का आह्वान किया।


निशांत सिनेमा में फौजियों को खुले विद्रोह के लिए बांटे गए पर्चे

महात्मा गांधी के भारत छोड़ों आंदोलन की तपिश अम्बाला में भी देखने को मिली। इसमें गांधी जी के दिए नारे करो या मरो ने लोगों में जोश भर दिया। नारे से उत्साहित स्वतंत्रता सेनानियों ने कैंट के निशांत सिनेमा में फौजियों और सरकारी कर्मचारियों को 'आजादी का मोर्चा' नाम से पर्चे बांटे। इसमें जनता से खुले विद्रोह का आह्वान किया गया था। इस मामले में अंग्रेजी सरकार ने कार्रवाई करते हुए खादी भंडार से काली चरण, राम चंद्र जिंदल, हजारी लाल, ब्रम्हानंद और केदार नाथ शर्मा को 6 महीने से लेकर एक साल तक की जेल हुई। 

भाना सिंह राजपूत ने बसाया था बब्याल 

14वीं से 15वीं शताब्दी में बब्याल को भाना सिंह राजपूत ने बसाया था। इस गांव का संबंध जैसलमेर के भाटी राजपूतों से माना जाता है। उस समय बब्याल का रकबा एक बावनी था यानी 52 हजार बीघा जमीन (10400 एकड़) थी। वर्ष 1843 में अंग्रेजों ने अम्बाला में अपनी छावनी बनाई और गांव के रकबे को 99 साल की लीज पर एक पाई या एक आना प्रति एकड लिया था।  

राष्ट्रवादिओं का सम्मान करने पर डीसी ने बीहटा पंचायत की बर्खास्त 

15वीं शताब्दी में बसे बीहटा गांव भी एक बावनी था। आजादी की लडाई में यहां के लोगों ने भी खूब बढ़-चढ़ कर भाग लिया। नमक सत्याग्रह आंदोलन को बल देने के लिए गांव-गांव में राष्ट्रवादियों के जत्थे घूम-घूम कर जन जागरण में शामिल होने के लिए लोगों को जागरूक कर रहे थे। उसी दौरान एक जत्था जन जागरण के बाद रात को बीहटा चौपाल पहुंचा तो उनका बहुत सम्मान किया गया। खाना खिलाने के बाद गांव में ही रात को उनके विचार व भाषण सुने गए। इस पर कार्रवाई करते हुए तत्कालीन डीसी ने पंचायत को बर्खास्त कर दिया। इसमें सरपंच मंगल सिंह व पंचायत के अन्य सदस्य करतार सिंह, बड़मन सिंह, गूजर सिंह और कपूर सिंह शामिल हैं। यहीं जत्था ट्रेन लेने के लिए बराडा पहुंचा तो स्टेशन मास्टर व अन्य कर्मचारियो ने उनका स्वागत किया। इससे खफा अंग्रेजी सरकार ने  कार्रवाई करते हुए बराड़ा के स्टेशन मास्टर बापू शालिग्राम, असिस्टेंट स्टेशन मास्टर बदरी नाथ और टेलिग्राफ लिपिक शिवकरनदास को बर्खास्त कर दिया। 

नमक कानून तोड़ने पर बीहटा के स्वतंत्रता सेनानियों को हुई जेल 

नमक कानून तोड़ने पर बीहटा के भोलाराम और ठाकुर रत्नसिंह को 6 महीने की जेल हुई। वहीं जनजागरण में जुटे दूसरे जत्थे में बीहटा के मानसिंह चौहान, फतेह सिंह, गणेशी लाल, कुंदन सिंह, मिठ्ठन लाल को अम्बाला शहर में बंदी बनाया गया। इन्हें 6 महीने की सजा हुई। इसी तरह शमशेर सिंह, शेर सिंह, शिव सिंह, याद राम को भी 3 से लेकर महीने तक की सजा हुई।


ठाकुर रत्न सिंह पिछड़ो में शिक्षा के प्रसार के लिए जुड़े थे अछूतोद्धार कमेटी से

मुलाना के महाराणा प्रताप नेशनल कॉलेज की आधार शिला रखने वाले ठाकुर रत्न सिंह ने भारत छोड़ो आंदोलन में गणेशीलाल, कुंदन सिंह, शेर सिंह और शिव सिंह ने अपनी गिरफ्तारी दी। आंदोलन के अलावा वह पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए अछूत्तोदार कमेटी से भी जुड़े। इसके माध्यम से इन्होंने पिछड़े वर्ग से आग्रह किया कि पिछड़ापन दूर करने के लिए शिक्षा को सहारा बनाओं। 

Saturday, 18 May 2019

लोकतंत्र में यथा प्रजा तथा राजा



मतदान करने का हक ही असल में लोकतंत्र है। यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें नागरिक स्वेच्छा से दूसरे नागरिक को समाजहित और देशहित में स्वयं पर शासन करने का अधिकार देता है। यह व्यवस्था संविधान के तहत पूर्व निर्धारित नियमों से संचालित होती है। लेकिन यह तभी   सफल है जब नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए घरों से निकले। वह पांच साल में एक बार अपने मत से नेता के शासन और कुशासन की समीक्षा करता है।
स्वस्थ्य़ लोकतंत्र के लिए नेता से ज्यादा जनता अधिक जिम्मेदार होती है। जनता जैसी होगी उस पर वैसा ही शासन करने वाला नेता होगा। यह स्थिति राजतंत्र से थोड़ी भिन्न है। यथा राजा तथा प्रजा अर्थात राजतंत्र में जैसा राजा होता है उसकी प्रजा भी वैसी ही होती है। प्रजा में राजा के ही गुण और आदर्श झलकते हैं। लेकिन लोकतंत्र में राजतंत्र से उलट स्थिति होती है। यहां जैसी प्रजा (जनता) होगी वैसा ही राजा (नेता) होगा मतलब यथा प्रजा तथा राजा। नेता उतनी ही इमानदारी से शासन करेगा जितनी ईमानदारी से जनता ने वोट किया है। लेकिन देश में कितने लोग कितनी ईमानदारी से वोट करते हैं यह जनता भी जानती है और नेता भी। इसी के चलते नेता जनता की एक जेब से रुपये निकाल कर दूसरी जेब में रुपये डालने का खेल खेलता है। वहीं, जनता भी इस खेल में आकर छोटे फायदे के लिए बड़ा नुकसान कर बैठती है।
नेता को पांच साल तक कोसने वाली जनता निर्णय के दिन (मतदान के दिन) छुट्टी मनाने में या आराम करने में घरों में दुबक जाती हैं। इसमें अधिकतर संख्या उन्हीं तथा-कथित लोगों की है जो ऑफिस की टेबल पर बैठकर, पार्क में दोस्तों के सात गप्पे मारते हुए या फिर नुक्कड़ पर बनी चाय की दुकान पर चुस्कियां लेते हुए कहते हैं कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता। ऐसे नागरिकों के होते सच में देश का कुछ नहीं हो सकता। देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी से भागते इन लोगों के लिए यह तस्वीर शायद कुछ प्रेरणा बन जाए। यह तस्वीर वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के सातवें चरण के मतदान के समय हैदराबाद के फिल्मनगर नगर में ली गई थी। यह महिला उन लोगों के गाल पर तमाचे की तरह है जो स्वार्थ की गहरी नींद में सोए रहते हैं। शायद यह तमाचा उन्हें जगा दे। इसलिए आपसे विनम्र प्रार्थना है कि आप वोट कर अपने लोकतांत्रिक कर्तव्य का पालन करें।  

Wednesday, 20 February 2019

थोड़ा सब्र करो




गम का दौर है यारो
थोड़ा सब्र करो,
दिलों में आग है
थोड़ा सब्र करो,

ये वक्त नहीं है बस आँसू बहाने का
हलचल से भी दुश्मन ख़ौफ़ में है
थोड़ा सब्र करो,

तोपें, बंदूकें, टैंक सब तैयार हैं
अबके अमन की आशा नहीं होगी
थोड़ा सब्र करो,

घायल शेरों से वक्त नहीं पूछा करते
दुश्मन को जी लेने दो और दो दिन
थोड़ा सब्र करो,

इस बार सिर्फ प्यादों पर वार नहीं होगा
सीधे आकाओं को दफ़नाएँगे
ये जवानों की है योजना
थोड़ा सब्र करो।।

Thursday, 28 June 2018

कुमकुम और कलावा पहने पर छात्रों को प्रिंसीपल ने दी स्कूल से निकालने की धमकी




तिरुवनंतपुरम : केरल के पलक्कड जिले के एक सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक ने माथे पर कुमकुम और हाथों में कलावा पहनने वाले छात्रों को स्कूल से निकालने की धमकी दी है। प्रिंसीपल ने परिजनों को भी कहा है कि स्कूल में छात्रों के धार्मिक चिन्ह पहनने को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
टाइम्स नॉउ वेबसाइट के अनुसार  परिजनों ने प्रिंसीपल पर आरोप लगाया है कि हमारे बच्चे अभी पहली और दूसरी कक्षा के छात्र हैं। इस तरह के आदेश उनके कोमल मन के विकास में बाधा बनेंगे। ऐसे में शिक्षा के नाम पर प्रिंसीपल स्कूल में सांप्रदायिकता फैला रहे हैं, जबकि वह एक सरकारी स्कूल है। किसी धार्मिक संस्था के साथ इस स्कूल का कोई संबंध नहीं है। इसके बावजूद वह संप्रादायिक आदेश बच्चों पर थोपते हैं। ऐसा उन्होंने पहली बार नहीं किया है। लेकिन इस बार उन्होंने आधिकारिक रूप से एक सर्कुलर (परिपत्र) भी जारी कर दिया है। साथ ही बच्चों को धमकी दी है कि अगर वह कुमकुम या कलावा पहनेंगे तो उन्हें स्कूल से निकाल दिया जाएगा। हाल में हमने पेरेंट्स टीचर मिटिंग में इस विवादास्पद आदेश पर आपत्ति दर्ज कराई थी। लेकिन स्कूल प्रबंधन ने हमारी आपत्तियों पर ध्यान नहीं दिया।
स्त्रोत : 27 जून टाइम्स नॉउ
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Monday, 22 January 2018

फिल्म पदमावत् विवाद



पदमावत् फिल्म को सीबीएफसी ने सर्टिफिकेट दे दिया। फिल्म रिलीज की तारीख भी घोषित हो गई। लेकिन राजपूत समाज की आपत्तियां अभी भी बरकरार हैं। फिल्म अपनी शुरुआत से ही विवादों में घिरी है। करीब डेढ़ साल पहले इस फिल्म के निर्माता संजय लीला भंसाली के साथ हुई मारपीट के बाद यह विवाद सुर्खियों में आया था। तभी से फिल्म का विरोध कर रही करणी सेना रिलीज से पहले इसे दिखाने की मांग कर रही है। ताकि रानी पदमावती की छवि को लेकर किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ हुई हो तो अपनी आपत्ति दर्ज कराई जा सकें। फिल्म दिखाने का लिखित में आशवासन भंसाली ने करणी सेना को दिया था। फिल्म पूरी होने पर फिल्म रिलीज की तारिख एक दिसंबर तय कर दी गई। फिल्म को अभी तक सीबीएफसी के पास नहीं भेजा गया था। अगर फिल्म रिलीज की तय प्रक्रियाओं को अपनाया जाता है तो भी फिल्म एक दिसंबर को रिलीज नहीं हो सकती थी। क्योंकि सीबीएफसी की वेबसाइट के अनुसार एक फिल्म की रिलीज के लिए कम से कम 68 दिन का समय लगता है। जैसा की जाहिर था फिल्म एक दिसंबर को रिलीज नहीं हुई। इसका सारा ठीकरा गुजरात चुनाव और करणी सेना पर फोड़ दिया गया। इसी बीच करणी सेना के कुछ अमान्य लोग और अन्य राजपूत संगठनों के लोगों की अभद्र टिप्पणियों ने मामलें को उलट कर रख दिया। भंसाली और दीपिका पादुकोण के लिए अपशब्द बोले गए जो उचित नहीं थे
भंसाली ने फिल्म को सीबीएफसी को दिखाने से पहले देश के कुछ चुनिंदा पत्रकारों को दिखाई। यह फिल्म के पक्ष में माहौल बनाने का एक बड़ा जरिया था।

इसी दौरान बुद्धिजीवी बिग्रेड़ ने रानी पद्मवती के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए। उन्हें एक कोरी कल्पना कहना शुरू कर दिया और इसे सूफी कवि मुहम्मद जायसी की 1540 में लिखी गई सिर्फ एक काव्य रचना कहा।यहां राजपूत समाज की मान्यताओं का माखौल उड़ाया गया। उनकी आस्था विश्वास की खिल्ली उडाई गई।

पद्मावत फिल्म विवाद पर ये वीडियो देखें :-

लेकिन आपको बता दूं कि मीरा शोध संस्थान से जुड़े चित्तौड़ गढ़ के प्रो. सत्यनारण समदानी बताते है कि मलिक मुम्मद जायसी सूफी विचारधारा के थे, जो अजमेर दरगाह से आते थे। इसी दौरान उन्होंने कवि बैन की कथा को सुना जिसमें पदमावती का जिक्र था। स्पष्ट है जायसी ने कवि हेतमदान की 'गौरा-बादल' कविता से कुछ अंश अपनी काव्य रचना(पदमावत्) में सम्मिलित किए थे।
प्रो. समदानी कहते है कि 'छिताई चरित' की रचना ग्वालियर के कवि नारायणदास ने जायसी के पद्मवत से 14 साल पहले की थी। हस्तलिखित इस ग्रंथ का संपादन ग्वालियर के हरिहरनाथ द्विवेदी ने किया था। लिपियों के विद्वान अगरचंद नाहटा ने भी इसका रचनाकाल 1540 से पहले का माना है।

विवाद को बढ़ता देख फिल्म पर राय देने के लिए सीबीएफसी के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने एक सलाहकार समिति बनाई। सलाहकार समिति में जयपुर विश्वविद्याल के दो इतिहासकार चंद्रमणी सिंह और प्रोफेसर केके सिंह और रानी पद्वाती के परिवार की 76वी पीढ़ी के राजा अरविंद सिंह मेवाड़ को शामिल किया गया। इन्होंने भी इस फिल्म पर आपत्ति दर्ज कराई।

देश के कुछ् राज्यों ने विरोध को देखते हुए अपने यहां फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी। लेकिन देश की सवोच्च अदालत ने सिर्फ दो दिन के भीतर इस केस की सुनवाई कर राज्यों से रोक हटाने को कहा। वैसे घोटालों में इनके फैसले जल्दी नहीं आते। आदमी मर जाता है लेकिन केस जारी रहता है।

 अगर एक घटना को छोड़ दें तो ड़ेढ साल से जारी राजपूत समाज के शांतिपूर्ण आंदोलन की सरहाना करनी चाहिए क्योंकि कोई गाड़ी नहीं जलाई गई किसी सरकारी संपत्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया। लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से जारी इस आंदोलन को सरकार और अदालत गंभीरता से नहीं ले रही। क्योंकि इस देश में जिस भाषा को सरकार समझती है उस भाषा का इस्तेमाल अभी तक नहीं किया गया। ज्यों ज्यों रिलीज की तारीक नजदीक आ रही है। किसी बड़ी घटना होने से इन्कार नहीं किया जा सकता।

Monday, 15 January 2018

छोटी मुलाकात बड़ी बात


दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्वपुस्तक मेला-2018 का आयोजन हो रहा है। बचपन से ही मुझे किताबें अपनी ओर खींचती है। इसलिए पुस्तक मेला हो और मैं न जाऊ ऐसा मश्किल है। मैंने अपने दफ्तर के अवकाश के दिन वहां जाना तय किया। इस विषय में अपने मित्र श्रवण से बात की तो वह भी राजी हो गया। हम पुस्तकों के इस सागर में अपना-अपना मोती खोज रहे थे। इसी बीच श्रवण को फोन आया और उसे जाना पड़ा। लेकिन मेरी खोज अभी पूरी नहीं हुई थी। कैसे वहां हर किताब को खोलते-बंद करते पांच घंटे से ज्यादा बीत गए पता ही नहीं चला। किसी खास किताब की खोज करते करते मैं गीता प्रेस गोऱखपुर के स्टॉल पर जा पहुंचा। वहां का नजारा सामान्य की तुलना में थोड़ा भिन्न था। हालांकि यह अन्य लोगों के लिए सामान्य हो सकता है। पर मुझे थोड़ा अलग लगा। क्योंकि वहां दो युवक किन्हीं खास किताबों के लिए एक स्ट़ॉल कर्मचारी से बात करने में व्यस्त थे। वहीं अन्य दो युवक उस भीड़ में अपनी पसंद की किताब खंगाल रहे थे। उनकी बातचीत हावभाव आपको उन्हें देखने के लिए विवश कर देते। बशर्ते आप अपनी दुनिया में मशरूफ न हों। मैं वहां खड़ा उन्हें ही देख रहा था। सिर पर नीली पगड़ी और नीली जैकेट पहने वह छह फुटा नौजवान पीठ पर एक बड़ा सा थैला लिए था। 

Tuesday, 28 November 2017

रोहित के सवाल पर बवाल क्यों ?




हाल ही में रोहित सरदाना के एक ट्वीट पर बहुत बवाल होते देखा तो मन किया एक बार फिर से ट्वीट को पढ़ लिया जाए। ट्वीट में सरदाना ने पांच नामों का जिक्र किया है। ये नाम है राधा, दुर्गा, फातिमा, आयशा और मेरी। यहां तक तो सब ठीक था। पर कुछ तथाकथित बुद्धीजीवियों से सवाल पूछते हुए उन्होंने इन नाम के आगे सैक्सी शब्द का विशेषण लगा दिया। अब एक धर्म विशेष के लोगों की भावनाएं इस पर आहत हो गईं। लेकिन असल मुद्दा इस हो-हल्ले में गोण हो गया। सरदाना का सवाल तो जस का तस बना हुआ है।

Thursday, 7 September 2017

गौरी लंकेश की हत्या...


मैं पेशे से पत्रकार हूं इसलिए आज जब किसी पत्रकार की हत्या की खबर सुनता हूं तो मुझे ऐसे लगता है जैसे मेरे ऊपर ही हमला हुआ हो । गौरी लंकेश की हत्या जिसने भी की है, वह अपराधी है। उसे हर कीमत पर सजा मिलनी ही चाहिए। इसमें कोई दोराय नहीं है। किसी की हत्या को कोई भी भाषा या शब्दावली का इस्तेमाल कर न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। पत्रकार की अपनी विचारधारा हो सकती है। वह अपने आप को किसी भी विचारधारा के नजदीक पा सकता है। मेरी बोद्धिक क्षमता के अनुसार यह गलत नहीं है। 

गलत यह है जब खबर देते या लिखते समय, खबरों में अपनी विचार धारा का मिश्रण किया जाए। गलत यह है- जब एक समुदाय की गलती को छुपा लिया जाए और दूसरे की गला फाड़ के चिल्लाया जाए। यह सब गलत है। पत्रकार का काम सत्य और तथ्य को सबके सामने रखना है। न्यायाधीश बनकर जजमेंट सुनाना नहीं।
मै पत्रकारों की जमात में नया हूं। मुझसे अभी बहुत गलती होती होगी। शायद आगे भी हो क्योंकि मैं इंसान हूं । गलती कर के ही सीखता हूं। कभी खुद की गलती से कभी दूसरे की गलती से। पर हां, सीखने की कोशिश जरूर करता हूं। लेकिन, कभी मैं जजमेंट नहीं सुनाता। जैसे इस हत्या के बाद सुनाया गया है। खैर पुलिस अभी भी जांच कर रही है। हत्या किसने की प्रारंभिक जांच में उन्हें नहीं पता। पर राहुल गांधी को पता है। बड़े टीवी चैनलो के कुछ बड़े पत्रकारों को भी पता है कि हत्या किसने की है। 

Friday, 28 July 2017

आज राजनीति मतलब ‘राज’ करने की ‘नीति’



बिहार के ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आज के दौर की राजनीति में कोई सिद्धान्त नही हैं। आज राजनीति केवल ‘राज’ करने की ‘नीति’ तक सीमित हो गई है। सिद्धान्त का झुनझुना जनता को बहलाने का बस साधन भर है । 


राजनीति के पंडित आज नीतीश के कदम पर सवाल उठा रहे है, वो लोग तब ब्रह्मज्ञान से वंचित हो गए थे, जब बीजेपी के साथ 17 साल पुराने गठबंधन को तोड़, नीतिश कुमार ने  चिर प्रतिद्वंद्वी लालू यादव से गलबहियां कर आरजेडी से गठबंधन किया था। तब भी अवसरवादिता थी लेकिन तब राजनीतिक बुद्धिजीवियों को इस कदम में सिद्धांत और सेकुलरइज्म नजर आए थे, लेकिन आज कोरी अवसरवादिता। कुछ ने इस कदम को मास्टर स्ट्रोक बता नीतीश कुमार को राजनीति का माहिर करार दिया। जब हमारी सोच में ही सिद्धांत और सच्चाई नहीं है जहां पर कथनी और करनी में अंतर रखने वाले को ही राजनीति में शातिर खिलाड़ी माना जाता है। तो बाकी बचा ही क्या है?

Tuesday, 25 July 2017

असफलता से सफलता की ओर



आज दुनिया पहले की तुलना में काफी बदल चुकी है। हर दिन के साथ, इसके बदलने की रफ्तार बढ़ती ही जा रही है। बदलाव संसार का नियम भी है और जरूरत भी। उसी तरह, कुछ लोग किसी की सफलता और असफलता का पैमाना किसी एक हार जीत से लगाने लग जाते है। यही दबाव व्यक्ति को असफलता के बाद तोड़ने लग जाता है। कुछ इसे झेलने में कामयाब होते है तो कुछ टूट जाते है। बस, यही वक्त होता है अपने आप को सभालने का, अपने व्यक्तित्व में निखार लाने का। जब तक आप जीवन में असफलता का स्वाद नहीं चखते तब तक आप व्यक्तित्व की उस गहराई तक नहीं पहुंचते, जहां पर आप दूसरे व्यक्ति की सफलता की कद्र करना नहीं सीखते। यहीं, वह भावना है जो आप को जमीन से जोड़े रखती है। कोरी सफलता बिन डोर की पतंग जैसी होती है जो अच्छे समय की हवा में आसमान की बुलंदियों को छूती है लेकिन बूरे समय की शून्यता उसे क्षण भर में जमीन पर लाकर पटक देती है।

असफलता का अर्थ यह कभी नहीं होता कि आप काबिल नहीं है। बल्कि, हम इसे खुद जान सकते है कि असफलता हाथ क्यों लगी ?  इसका पहला तरीका यही है कि. क्या कार्यसिद्धी के लिए हमने पूरे मनोवेग से मेहनत की। दूसरा, जिसके लिए हम मेहनत कर रहे है क्या हम वह सच में चाहते है? तीसरा, जो लोग आपकी काबीलियत की जांच रहे हैं, क्या उनका काबिलीयत नापने का पैमाना ठीक है? तीसरा कारण आपको कुछ अटपटा सा लगा होगा। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि आप असफल इसलिए हुए है कि आप काबिल नहीं हैं बल्कि यह भी हो सकता है कि सामने वाला आपको सही परख ही नहीं पाया हो।

अमिताभ बच्चन आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं लेकिन एक वक्त था कि उनकी लाख कोशिशों के बाद भी, उन्हें जीवन में कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। उनमें से ही एक किस्सा है, जब वह ऑल इंडिया रेडियों पर काम के सिलसिले में गए लेकिन असफल हो गए। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने यह माना भी कि वह तीन बार रेडियो उद्घोषक बनने के लिए ऑल इंडिया रेडियो गए लेकिन कामयाब नहीं हो सके। अगर दूसरे पहलू को देखें तो यह अच्छा ही हुआ, नहीं तो, फिल्म जगत को एक मेगा स्टार से वंचित रहना पड़ता।

इसलिए हम कह सकते है कि असफलता कई बार आपको गढ़ती है, तराशती है और निखारती है जो सफलता के लिए जरूरी है। दूसरे शब्दों में, असफलता कई बार आपको सफलता की और लेकर जाती है। बशर्ते कोशिश जारी रहनी चाहिए।


  

Tuesday, 11 July 2017

अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला


अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले ने एक बात तो तय कर दी है कि अब हमले की कड़ी निंदा करने का समय निकल गया है बल्कि कड़े फैसले लेने का समय आ गया है। आए दिन हो रहे आंतकी हमलों मे मरते जवानों से भारतीय जनता का सब्र अब टूट रहा है। विपक्ष में रहते हुए पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने का ख्वाब देखने वाले अब क्यों सिर्फ कड़ी निंदा कर, हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाते है।

Sunday, 9 July 2017

गुरू बिन ज्ञान नहीं


गुरू बिन ज्ञान नहीं, गुरू बिन ध्यान नहीं,
गुरू बिन सही-गलत की पहचान नहीं,
गुरू घर भेद नही, गुरू से विच्छेद नहीं,
गुरू एक आस है, गुरु विश्वास है,
गुरू रक्षक है, गुरू मार्गदर्शक है,
गुरू-शिष्य हर संबंध से खास है,
गुरू कड़ी धूप में शीतलता का एहसास है,
गुरू उर्जा पुंज है, गुरू विचार कुज है,
गुरू जीत का दांव है, गुरू डुबते की नाव है
गुरू एक कृतिक है, गुरू ही संस्कृति है
गुरू का कोई मेल नहीं, गुरू बनना कोई खेल नहीं।।

Tuesday, 20 June 2017

नारों में सिमटा ‘बेटी पढ़ाओं बेटी बचाओं’ अभियान


हम ‘बेटी पढ़ाओं बेटी बचाओं’ का खूब नारा लगाते हैं पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है। बिहार के बेगूसराय की घटना जिसमें स्कूल की दो छोटी बच्चियों की ड़्रेस उतरवाकर उन्हें अंड़रगार्मेंटस में ही घर भेज दिया गया, क्योंकि गरीब पिता ने यूनिफॉर्म की राशि समय पर जमा नहीं कराई। इस तरह की घटना आज के आधुनिक समाज पर एक जोरदार तमाचा है जो यह समझाने के लिए काफी है कि जमीन पर अभी काफी कुछ करना बाकी है। हालांकि इस घटना के आरोपी प्रिंसिपल और टीचर को गिरफ्तार कर लिया गया है और बिहार राज्य शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी ने घटना की निंदा की है और जांच के बाद दोषियों को सजा की बात भी कही है। पर क्या वह इस बात का आश्वासन दे सकते है कि ऐसी घटना बिहार में फिर नहीं घटेगी? शिक्षा तंत्र की खामियों को लेकर बिहार पिछले दो साल से सुर्खियों में बना हुआ है। अगर एक्शन की बात करें तो एक्शन के नाम पर सिर्फ जांच का आश्वासन है। केंद्र सरकार भी शिक्षा बजट में केवल मामूली बढ़त की है जो भारत जैसे देश में केवल ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। समाज को आगे बढ़ाने में जो सबसे बड़ा हथियार बन सकता है, वह है शिक्षा। अगर हम नौ लाख करोड़ रूपये बिजनेस हाउस का माफ करते है, तो क्यों नहीं हम एक ऐसा तंत्र विकसित कर सकते, जिसमें जीवन की बुनियादी चीजों को गरीबो के लिए मुफ्त कर दें जैसे शिक्षा और चिकित्सा। ताकि भारत का कोई भी नागरिक इनके अभाव में अपना जीवन न गवाएं।   

Sunday, 18 June 2017

पापा मैं अब बड़ा हो गया हूं


पापा मैं अब बड़ा हो गया हूं,
मै आप जैसा हूं या आप हो गया हूं,
सब लोग बोलते है बाप पर गया है
आप को लगता है, मैं आप पर गया हूं

मेरी नादानियों के मौन गवाह हैं आप,
जानते हुए भी अंजान हैं आप,
कितनी ही मुश्किलों से लड़ा हूं मैं,
जानता था कि पीछे खड़े हैं आप,

मैं कितना सीखा हूं आप से,
ये भूल जाता हूं,
मैं अब इतना बड़ा हो गया हूं कि,
आप को सिखाता हूं,
कई शब्द चुभते होंगे मेरे,
सच कहूं, मैं बाद में पछताता हूं।।

Saturday, 10 June 2017

कहीं किसान मरा


गजब का माहौल हो गया,
कहीं किसान मरा,
कहीं राजनीतिक गोल हो गया,

परिवार की फिक्र किसे,
वोटो का ये धंधा है,
आँखे तो सबकी है,
इंसान अब अंधा है,

गरीब के हिस्से भूख आई,
अमीर के हिस्से रोटी,
जिसको जितनी चाहिए
उसकी ही किस्मत खोटी,

सत्ता और विपक्ष में,
मचा घमासान है,
होना-वोना कुछ नहीं
दो दिन का ये नामोनिशान है,

लाशों पर गिद्ध नहीं
अब नेता मंडराते हैं,
अपने यहां कुछ नहीं होता,
दूसरे को गलियाते हैं,

काश के संसद उड़ जाती
नेताओं की नई पौध आती

अब पुराने पेड़ो के कीड़े,
पौधों मे आ गए,
सिर्फ चेहरे बदले है साहब,
नेता वहीं पुराने आ गए।।



Sunday, 28 May 2017

आंदोलन का ट्रेंड़


मुझे आज कल एक चीज बहुत महसूस हो रही है शायद आपको भी हो रही होगी शायद नहीं भी कि अन्ना आंदोलन के बाद हमारे देश मे आंदोलन करने का एक ट्रेंड निकल पड़ा। हर दो चार महिने बाद कोई भी कही भी खड़े होकर तीन-चार अपनी पसंद के नारे लगाता है, विरोध करता है। 4-5 गंभीर समस्याओं की सूची अपने मुखार बिन्द से गिनाता है। अपनी कौम, अपनी जाति, अपने धर्म की बात करता है। देश का सच्चा नागरिक होने की और सविधान की कसमें खाता है। संविधान सभा के चेयरमैन रहे ड़ा भीमराव अंबेड़कर का नाम लेता है। गरीबो, मजबूरों, शोषितों, दलितों के हित के लिए लड़-मरने की बात करता है। कुछ दिन बाद उसके सोशल मीडिया पर कैंपेन चलते है लोगों को उसके बारे में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बताया जाता है कि यह वही शख्स है जो आपके अधिकारों के लिए लड़ रहा। कल तक उसके मौहल्ले के आखिरी मकान में रहने वाला आदमी, उस कथित नेता का नाम तलक नहीं जानता था। लेकिन कुछ दिनों में ही वह सोशल मीडियां में ट्रेंड करने लगता है। जब वह माल (खबर) बाजार में बिकने लायक बन जाता है। उसके बाद वह मुख्य मीडिया पर आना शुरू हो जाता है। अब उसे उसके मौहल्ले वाले ही नहीं बल्कि उसे वो लोग भी जानने लगते है जो उसके मौहल्ले के नहीं है। फिर उसके टीवी पर आने जाने का सिलसिला शुरू होता है। उसके कौम वाले, उसकी जात वाले, उसके धर्म वाले उसे ऐसे देखते है जैसे वह बहुत बड़ा समाजसेवी हो।

जबकि वह फल है उस नकारात्मक राजनीति का और विकृत चेहरा है हमारी समाचार पत्रों की मानसिकता का। जो बड़े चाव से इस तरह के कच्चा माल समाज से उठाते है और उसमें अपनी पसंद का फेर बदल करके फिर दुबारा उसे उसी बाजार में बेचते हैं। क्योंकि न्यूज, खंबर  यह समाचार पत्रों, चैनलों के लिए बस एक उत्पाद है। जिसे मिर्च-मसाला लगाकर अपनी पसंद के बाजार, और निर्धारित दर्शको को बेचा जाता है तभी तो उनकी दुकान चलेगी। यह लोग तर्क-वितर्क नहीं करते बल्कि अघोषित मुद्दे को घोषित मुद्दा बनाकर पेश करते है।  यह इन तथा कथित नेताओं से तीखे सवाल पुछने कि हिम्मत नहीं करते। वह उन्हें आइना भी नहीं दिखाते ताकि कल को उनका कच्चा माल (खबर) खराब न हो जाए। बल्कि उनका नामकरण कर देते नेता के रूप में।

अन्ना आंदोलन के बाद निकली नई पार्टी, फिर पाटीदार आंदोलन और अब यह भीम आर्मी वही कच्चा माल है जिसे न्यूज वाले बाद में पका पका कर खाएंगे। इससे दोनों के हित सध रहे है। एक शॉर्ट कट तरीके से नेता बन जाता और दूसरे को समाज में बेचने के लिए नया उत्पाद मिल जाता है।  

Saturday, 27 May 2017

कूड़े में भविष्य तलाशता बचपन...



बचपन और खेल एक दूसरे के पूरक माने जाते है। बच्चें जहां हो, जैसे हो वह खेल व खेलने का समय ढूंढ ही लेते है। चाहे वह पढ़ाई करते हो या घर की मजबूरी के चलते मजदूरी, वह खेलना नहीं भूलते। लेकिन कुछ बच्चों का बचपना बाल मजदूरी की भेंट चढ़ जाता हैं।

मां-बाप का दुलारा जिसे अभी ढंग से बोलना नहीं आता जो अभी दुनिया की दौड़ को जानता नहीं है। जिसके पैर चलते हुए भी लडखडाते है जो दुनिया की चाल से अभी वाकिफ नहीं हैं, जिसे मां का आंचल ही अपनी सारी दुनिया लगता है। जो पेट में होती कसन को सही परिभाषित नहीं कर सकता कि यह भूख है या कुछ और। घर से बाहर काम के लिए निकलता है। जिसका बचपन इतना मासूम है कि वह यह भी नहीं जानता कि जो काम वह रोजाना करता वह केवल उसकी ही नहीं बल्कि उसके मां-बाप की भी मजबूरी का परिणाम है।


काम पर अनायास ही जब कभी उसका मन खेलने के लिए मचलता, एक भारी आवाज उसे टोक देती। वह मन मसोस कर बैठ जाता लेकिन कुछ देर बाद फिर यही क्रम होता है। धीरे-धीरे उसकी कल्पना, उसकी इच्छा दम तोड़ रही होती है। जिसको वो जानते हुए भी पहचान नहीं पाता। वह यह जानता ही नहीं है कि उसका भविष्य दो जून की रोटी के लिए कुर्बान हो रहा है। बचपना कब खत्म हो गया उसे पता ही नहीं चला। वह पीछे मुडकर देखता है तो उसे नजर आता है कुड़े में भविष्य तलाशता अपना बचपन... 

Wednesday, 24 May 2017

शब्बीरपुर हिंसा के पीछे का सच

महाराणा प्रताप की जयंती मनाने के लिए 5 मई को शब्बीरपुर के 20-25 युवक तेज आवाज में गाना बजाते हुए, पास के ही शिमलाना गांव जा रहे थे। शब्बीरपुर गांव के प्रधान ने तेज आवाज पर आपत्ति जताई व अपने साथियों समेत उसे रोकने की कोशिश की साथ ही पुलिस को इस बाबत सूचना दे दी। प्रधान का कहना था कि कार्यक्रम के लिए प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई थी। गांव का प्रधान अनुसूचित जाति का है। एसएसपी सुभाष चन्द्र दुबे के मुताबिक पुलिस ने मौके पर पहुंच कर डिजे बंद करवाया व उन्हें शिमलाना गांव के लिए रवाना करने लगे।  इसी दौरान कार्यक्रम में जाते लोगों (राजपूतों) पर छतों के ऊपर से दलित समुदाय के लोगों ने पथराव शुरू कर दिया । जिसमें राजपूत समुदाय के 16 लोग घायल हो गये व सुमित सिंह नाम के 27 वर्षिय राजपूत युवक की मौत हो गई। इसकी सूचना जब शिमलाना कार्यक्रम में मौजूद राजपूतों को पता चली तो वह बड़ी संख्या में आए और उन्होंने दलित समुदाय 15-20 घेरों ( वह स्थान जहां पर भुस व पिटौड़ा आदि रखे जाते हैं) में पथराव और आगजनी की। तभी से दोनों समुदाय के बीज तनाव की स्थिति बनी हुई है।

 

डीएम नागेंद्र व एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे ने बताया कि 9 मई को भीम आर्मी नाम के दलित संगठन ने सहारनपुर के गांधी पार्क में बिना अनुमति के 5 मई की घटना के खिलाफ महापंचायत का आयोजन रखा। जब पुलिस बिना अनुमति के हो रहे आयोजन को रोकने पहुंची तो वे लोग उग्र हो गए। उन्होंने वाहनो और पुलिस पर पथराव शुरु कर दिया, जिसमें ड़ेढ़ दर्जन बाइक, दो बसे, तीन कारें जलकर खाक हो गई। बस में मौजूद 46 यात्रियों ने किसी तरह अपनी जान बचाई। यात्रियों के मुताबिक 8-10 नकाबपोश लोगों ने इस घटना को अंजाम दिया। एसपी सिटी और पत्रकारों पर भी हमला किया गया।

21 मई को हालात का जायजा लेने बसपा सुप्रीमो मायावती भी सहारनपुर के शब्बीरपुर व और चन्द्रपुरा पहुंची लेकिन उनके पहुंचने से पहले ही चंद्रपुरा के दलितों ने राजपूतों के घर पर पथराव व आगजनी की। उसके बाद राजपूतों ने भी अपनी तलवारें निकाल ली। हालात एक बार फिर तनाव पूर्ण बन गए।

 

5 मई के बाद से एक के बाद एक हुई घटनाक्रम पर नजर डाली जाए तो यह एक बढ़ी राजनीतिक साजिश लगती है। भीम आर्मी की भूमिका  भी संदिग्थ है। भीम आर्मी के मुखिया चन्द्रशेखर आजाद ने एक ऑडियो रिलीज किया जिसमें अपने सभी दलित भाईयों को 21 मई को जंतर-मंतर पर इकठ्ठा होने का आह्वान किया। इस ऑडियो क्लिप में वह अपने आपको ‘एडवोकेट चन्द्रशेखर आजाद रावण’ कहता है। इसके बाद ‘नीला सलाम’ कहकर ऑडियो खत्म करता है। नीला सलाम ‘लाल सलाम’ से बहुत मेल खाता है। अपने नाम के साथ ‘रावण’ जोड़ना और हक की लडाई की बात करते हुए नक्सल आंदोलन को सही ठहराने की कोशिश करना और वामपंथियों संगठनों की तरफ से भीम आर्मी को मिल रहे समर्थन से लगता है कि यह समाज को बांटने साजिश की जा रही है।

 

आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता डे ने आईएएनएस से कहा, “हमारी मांग है कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद पर लगाए गए आरोप वापस लिए जाएं और दलित ग्रामीणों को निशाना बनाने वाले और उनके घरों को जलाने वाले तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।” जिस प्रकार इसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी) की छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन के सदस्य विरोध-प्रदर्शन में सक्रिय हैं व आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष के बयान आ रहे हैं उससे दो समुदाय के बीच की खाई और बढ़ रही है।  

 

अब आप सोच रहे होगे कि अभी कोई चुनाव भी नहीं है तो इस में राजनीतिक साजिश का क्या औचित्य है?  यही समझने वाली बात है- उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा अपनी जमीन खोते जा रहे है। बड़ी संख्या में मुस्लिम और दलित बीजेपी का रुख कर रहे हैं और अब वामपंथी विचारधारा से भी अधिकतर युवाओं का मोह भंग हो रहा है और भाजपा को यूपी व देश के अन्य भागों में स्वीकारा जा रहा हैं। वह विपक्ष के लिए खतरें की घंटी हैं। इसी से पार पाने के लिए यह एक सोची समझी साजिश नजर आ रही है। अपने गिरते वोट बैंक और भाजपा के बढ़ते कद से निजात पाने के लिए, अपने वोट बैंक को एकजुट करना आवश्यक था। 2019 में भाजपा के विजयरथ को रोकने के लिए और हिंदु समाज के एक वर्ग को सर्वण समाज का ड़र दिखाकर काटना जरूरी था। दलित अस्मिता और अम्बेड़कर के नाम पर भीम आर्मी का मुखिया जिस प्रकार केंद्र में मोदी और प्रदेश में योगी पर सवाल खड़े कर रहा है। उसके अपने बयानों में मुस्लिम व दलितों की बात करना इस बात की पुष्टि करता है कि यह कोई दलित आंदोलन नहीं बल्कि साजिश है। जिसका आज नहीं तो कल सच सामने आ जाएगा। 

 

Tuesday, 23 May 2017

दोस्ती महज अफवाह है साहब


जो चाहा तुम में मिला नहीं
वरना,मिलने में कसर कोई बची नहीं,
जब छोड़ चुके थे साथ तेरा हम
ऐसी कोई कमी नहीं जो तुम्हें हम में मिली नहीं,

ऐसा भी नहीं की हमने बहुत चाहा तुमसे
                     बस हमारी तबियत तुमसे मिली नहीं,

दोस्तों के आगें तुम मुझे बदनाम करते हो
हमने दिन-को-दिन कहा,ये बात हमारी तुम्हें जमीं नहीं,

मैं सपनों में जिया नहीं करता
हकीकत में तुम मेरी, थी ही नहीं,

मैं आज के इश्क को इश्क नहीं मानता
दो बर्गर ना खिला पाए, वो मेरा साजन नहीं,

अब तो रिश्तों में लेन-देन की बात होती है
अब लोग कहां वो, जो दे दिया सो दे दिया 
पीछे परवाह की नहीं,

दोस्ती महज अफवाह है साहब
बस सीढ़ी का, कोई दुसरा शब्द मिला नहीं,

भले ही लाख सच्चे हो तुम
झूठ की दुनिया में तुम्हारी कोई कीमत नहीं,

मैं अकेले चले जा रहा हूं
मुझे भी किसी और की जरूरत नहीं,

यकीं है मुझे मेरे खुदा पर
औरों की अब मुझे भी फिकर नहीं।।