Sunday, 18 December 2016

क्या चाहता हूं मैं आसमां या ज़मी


क्या चाहता हूं मैं, आसमां या ज़मी,
क्यों मुस्कुराता हूं मैं, क्यों हैं ये हंसी।

जंमी पर आसमां के सपने है मेरे,
जब थकता हूं याद आती हैं ये जंमी।

उलझनों में उलझा रहता हूं,
मंजिल की तलाश में,कभी हार हैं कभी जीत
मैं उदास क्यों हूं, मैं इसकी तलाश में हूं

किस फेर में पड़ा हूं,
क्यों ये आसमां क्यों ये जमीं।

ख्याल रहता है, रब तेरा भी,
क्यों पाऊ आसमां क्यों ये ज़मीं।

क्या साबित करना है मुझको,
क्यों न बनू खुद आसमां ये ज़मीं।। 


Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Tuesday, 13 December 2016

न खुद को अकेला समझ, न ढूंढ ठिकाना रोने का




न खुद को अकेला समझ, न ढूंढ ठिकाना रोने का,
ये वक्त मिला है तुझ को, कुछ बनने का कुछ होने का,

ठुकरा दे आशाएं सबकी, कुछ कहने की कुछ समझाने की,
ये आग दिल में जगाए ऱख, कुछ बनने की कुछ होने की,

रख हौसला खुद पर, न घबरा विपत्तियों के वार से
जीती उन्होनें दुनिया जो नहीं डरते हार से,

बदले लकीरें हाथो की, जो चलें तेरे विरूद्ध,
तोड़ दे निराशाओ की बंदिशे, कामयाबी मिलेगी खुद व खुद

न खुद को अकेला समझ, न ढूंढ ठिकाना रोने का,
ये वक्त मिला है तुझ को, कुछ बनने का कुछ होने का,

तु न रुक, तु न ड़गमगा, रख होसला खुद पर,
हवा से तेज हो जा,

उखाड़ दे बाधाओ के हर पेड़ को, जो रूकावट बनें तेरे मार्ग की,
ये आग दिल में जलाए रख कुछ बनने की कुछ होने की,

तु न खुद को अकेला समझ, न ढूंढ ठिकाना रोने का,
ये वक्त मिला है तुझ को, कुछ बनने का कुछ होने का।।

Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Monday, 12 December 2016

समझदार कौन ?



आज हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। 21वी सदी बोलते हुए हम गर्व से सीना चौड़ा कर लेते हैं। तर्कों और कुतर्कों के बीना हम किसी भी बात को मानने के लिए तैयार नहीं होते। हम आज अपने आपको बुद्धिमान कहते हैं। विज्ञान को सभी चीजों का आधार मानकर, हर छोटी बड़ी चीज को विज्ञान के तुला में तौलते हैं और जब कुछ प्रश्नों का जवाब विज्ञान नही दे पाता तो कहते हैं, यह तो प्रकृति का चमत्कार है।
चमत्कार और विज्ञान एक-दूसरे से ऐसे जुड़े हैं जैसे उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव। विज्ञान चमत्कार को नहीं मानता लेकिन चमत्कार विज्ञान को मानता है। वो उस असीम शक्ति से जुड़ा है जो प्रकृति के सभी नियमों से ऊपर है।

क्या विज्ञान ऐसी किसी घटना को चमत्कार कहेगा जिसमें बुद्धिमान मनुष्यों से पहले जानवरों को प्राकृतिक आपदाओं का अनुभव हो जाता है। दक्षिणी तटों पर जब सुनामी आई तो उसके पहले वहां मौजूद पशु-पक्षिय़ों ने असमान्य व्यवहार करना शुरु कर दिया लेकिन ये असमान्य व्यवहार, हमारी नजरों में था, उनकी नजरो मे नहीं.. क्योंकि उन्हें पूर्वानुमान हो चुका था कि कुछ अनहोनी होने वाली है और वह किससे और किस ओर होने वाली है। वहां मौजूद हाथी अपने सवारों सहित ऊचें स्थानों की ओर दौड़ पड़े।  जिससे वे खुद को उस सुनामी से बचा पांए।

अपने आपको बौद्धिक कहने वाला इंसान उन जानवरों के व्यवहारिक ज्ञान और छिपी हुई शक्तिओं से हार गया। ( क्या हम सही मायनों मे बुद्धिमान हैं )
मैं डिस्कवरी चैनल पर एक रिपोर्ट देख रहा था। उसमें एक विशेष प्रजाति का तोता फल खाकर एक विशेष प्रकार की मिट्टी को खाते हैं। जब उनके इस व्यवहार का अध्ययन किया गया तो पता चला कि वे जो फल खाते हैं, वो जहरिले होते हैं। उसके प्रभाव को खत्म करने के लिए ये तोते उस विशेष प्रकार की मिट्टी का सेवन करते हैं। समझने वाली बात है कि उन्हें इस का ज्ञान कैसे हुआ, पहले तो यही कि वे फल जहरिले हैं दुसरा उसका उन पर दुष्प्रभाव पड़ेगा और यह केवल तोतों तक सीमित नही हैं। अन्य पशु-पक्षी भी कुछ इसी प्रकार का व्यवहार करते हैं, विशेष परिस्थितियों में।


लेकिन आज का आधुनिक मानव क्यों इस काबिल नहीं हैं कि वह इन सब विधाओ को जान सके और अपने मन को नियंत्रित कर सही फैसले ले सके। आज हम आधुनिक मानव का तमगा अपने गले में लटकाए घुम रहे हैं। लेकिन प्रकृति और सम्पूर्ण मानव समाज को अगर किसी से खतरा है तो इसी आधुनिक मानव से। यह सब कुछ जानता है लेकिन अपने स्वार्थ सिद्धी के लिए न केवल प्रकृति को बल्कि अपने वर्तमान के साथ-साथ भविष्य को भी विनाश की ओर ले जा रहा है। अपनी सीमित बुद्धि और क्षमताओं से पशु-पक्षी एक श्रेष्ठ प्रकृति प्रेमी का आचरण करते हैं किंतु आधुनिक मानव नहीं...

Saturday, 3 December 2016

राष्ट्रगान को लेकर गैर जरुरी बहस



हालही में सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा घर में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य कर दिया, जो इसे नहीं मानेगा उसके लिए सजा का प्रावाधान भी किया गया हैं। खैर मैं उसकी तकनीकी बारिकीयों में नहीं जाना चाहता। मुद्दा यह हैं कि राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवी वर्ग में, अब इसके पक्ष-विपक्ष की बात को लेकर भी बहस तेज हो गई हैं, जो गैर जरुरी है।

हर बात को व्यकितगत आजादी, व्यकितगत स्वतंत्रता से जोड़ना सही नहीं हैं। अगर इस देश का नागरिक ही, देश का सम्मान नहीं करता तो उसे वो भी इस देश द्वारा दिये गए नागरिक अधिकारों के लायक नहीं है। यह हमे समझना पडेगा।

पत्थर, छिनी और हथौड़े की मार झेल कर ही, मुर्ति का आकार ग्रहण करता हैं। इसलिए कानूनी बाध्यता भी जरुरी हैं। भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान वंदना कटारिया, जब फिल्म देखने हरिद्वार स्थित मॉल में गई, तो वहां पर राष्ट्रगान नहीं बजाया गया। जब इस बारे में मॉल अधिकारियों से बात की, तो उन्होंने कहा कि उन्हे अभी इसकी अधिसूचना नहीं मिली। इसके बाद वह फिल्म देखे बिना ही चली गई।


यह तर्क अपने आप में ही हास्यपद हैं। अपने देश के सम्मान करने के लिए भी अब हमें अधिसूचना की जरूरत पड़ेगी। यह घटना अपने आप में ही हमें चेताती हैं कि हम किस देश, राष्ट्र या समाज का निर्माण कर रहे हैं। क्या अपने देश और माता-पिता के सम्मान करने के लिए हमे सर्कुलर चाहिए।