Thursday, 25 February 2016

केजरीवाल एक रंग अनेक



केजरीवाल ने अपना राजनैतिक जीवन शुरू किया 2 अक्टूबर 2012 से। यह वह समय था जब लोग कांग्रेस के शासन से तंग हो चुके थे और अरविन्द केजरीवाल कांग्रेस डूबती नाव को पीछे छोड़ अपने आपको एक नए विकल्प के तौर पर प्रदर्शित कर रहे थे। आम आदमी पार्टी की शुरुआत से पहले उन्होंने अन्ना जी के साथ मिलकर इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन चलाया जो काफी हद तक सफल रहा। यंहा सफल होने को, दो सन्दर्भ में देख सकते है आंदोलन ऒर अरविन्द केजरीवाल। ये तो मै कह नहीं सकता की आंदोलन अपने मूल उदेश्य में कितना सफल हो पाया परन्तु केजरीवाल दिल्ली के मुक्यमंत्री बनने में जरूर सफल रहे। 

हमेशा आम आदमी की बात करने केजरीवाल जी ने वह सब किया जो कई बार आम आदमी भी नहीं करता। दिल्ली का चुनाव लड़ते हुए। उन्होंने अपने बच्चो की कसम खाई कि वह किसी भी पार्टी का समर्थन नहीं लेंगे परन्तु उन्होंने कांग्रेस पार्टी का समर्थन ले लिया। कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसने वाले और शीला दीक्षित के भ्रस्टाचार के सबूत हमेशा अपने साथ ले कर चलने वाले केजरीवाल जी, सत्ता में आते ही सबकुछ भूल गए। जो आम इंसान चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो ? जब अपने बच्चे की कसम खाता है तो उसे पूरी जरूर करता है या कोशिश करता है लेकिन सत्ता की कुर्शी दिखते ही वह अपने आदर्श और उसूल भूल गए । 

अरविन्द केजरीवाल जी नवम्बर 2013 को बरेली के मौलाना तौकीर रजा खान से मिलते है कि वह उन्हें समर्थन दे दिल्ली में और आप पार्टी की रैली को संबोदित करे। क्योकि दिसम्बर 2013 में दिल्ली के चुनाव होने थे।  आपको बता दे ये मौलाना तौकीर रजा खान वही है जिहोने 2007 में बांग्लादेश की लेखिका तालीम नसरीन  सिर कलम पर इनाम रखा था । यह उनका मुस्लिम कार्ड था। 

उसके बाद वह कहते है कि वह लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ा वो भी किसके खिलाफ मोदी जी के। वह चुनाव सोनिया गांधी के खिलाफ नहीं लड़ते जिन्होंने 10 साल अभी शासन किया है और आजादी के बाद से ही यह पार्टी सबसे ज्यादा सत्ता में रही है।   

हैदराबाद में एक छात्र आत्महत्या कर लेता है उस पर राजनीती करने हैदराबाद चले जाते है। यह इनका दलित कार्ड था। हालांकि इससे पहले भी कांग्रेस के शासन के दौरान 7 दलित छात्र आत्महत्या करते है।  तब नहीं पहुँचते। जबकि अपने राज्य दिल्ली में 19 जनवरी से 21 जनवरी  तक 8 या 10 लोग सर्दी से मर जाते है उनके पास नहीं जाते ताकि और लोग सर्दी से न मरे, उसकी व्यवस्था नहीं करते परन्तु हैदराबाद चले जाते है। 

Monday, 22 February 2016

देशद्रोही नारे जिन्हे नई विचार धारा लगती है



जे एन यु विवाद 9 फरवरी से शुरू हुआ और अब तक जारी है। क्या यह विषय सही मायनो में इतना लम्बा चलना चाहिए था ? आपको 9 फरवरी को लगाए वो नारे याद होगे। भारत को तोड़ने वाले, भारत की बर्बादी की दुआ मागने वाले, कौन लोग थे ? कौन अफजल को शहीद बता रहे थे ? वो लोग कौन थे जो "अफजल हम शर्मिदा है, तेरे कातिल जिन्दा है" जैसे नारे लगा रहे थे ? वो कौन लोग थे जो उन नारो के समर्थन में नारे लगा रहे थे ? कौन है उमर खालिद, कह्नैया कुमार, अनिर्बान भट्टाचार्य, आदि आदि। ओह माफ़ कीजिएगा एक ओर महत्वपूर्ण नाम मै लेना भूल गया अपराजिता। अब आप पूछेगे ये अपराजीता कौन है ? आपको बता देता हूँ अपराजीता जी है सीपीआई के नेता डी. राजा की बेटी। वह भी तब से पुलिस से बचती फिर रही थी। अब आप समझ ही गए होगे ये मामला लम्बा क्यों चला और इतना हो हल्ला क्यों मचा।  


जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्याल जब स्थापित जब हुआ।  उसके बाद से ही उसमे अध्यापको की नियुक्ति का कार्य ये वामपंथियो की विचारधारा से प्रभावित कमिटी ही करती है।  अब ये चुनती भी अपनी विचार धारा के लोगो को है। लेकिन जब से नई सरकार आई है तब से जे एन यु के टीचर एसोसिएशन में कुछ हलचल नज़र आ रही है। अगर अब उनके विचारधारा के लोग नहीं चुने जाते तो इसका भगवाकरण हो रहा है। खैर ये आरोप तो लगते रहगे लेकिन कभी साबित नहीं होते।  

2000  में जे एन यु में भारत और पाक्सितान के बीच में एक मुशायरा हुआ था। उसमे एक शायर फातिमा रियाज़ ने भारत का मज़ाक उड़ाया। वहां पर बैठे दो सेना के जवान ने जब इस बात का विरोध किया तो वहां बैठे जे एन  यु  के तथाकथित विद्यार्थियों ने उनकी पिटाई कर दी।  उनको इस कदर मारा के उनको अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।

अपनी पहचान की तलाश में निकल पड़ा हूँ



अपनी पहचान की तलाश में निकल पड़ा हूँ, 
मंजिले न सही रास्ते तो है,

क्यों रोक रखा था मैंने खुद को, औरो के लिए, 
जाने के बाद कौन याद रखता है,

रास्ते के सहारे मंजिले कब तक ढूंढेगे, 
जब रास्ते ही मंजिले बन जाए, तो क्या कहने,

कौन चला है किसके पीछे,, 
बस एक भीड़ है और हाथ में रस्सी है,

दिमागों ने कब याद रखा दिलो को, 
ये एहसास कुछ वक़्त का है,
ख्वाइस रखी है सिर्फ एक पहचान की, 
जब जाऊ तो हर आँख में पानी हो,

शबनम ना बन सका तो आँखों का मोती ही सही,
गिरते-गिरते किसी के काम तो आया,

अरमानो की उम्र बहुत छोटी है मेरे, 
देखते देखते न बदल जाए, तो कहना,

कशक दिल में बस इतनी सी है,
 बहुत सीख के निकला हूँ, बहुत सीख के आउगा।।

Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।
   

Friday, 19 February 2016

नहीं रूठता अब दिल किसी से, ना चाहत है अब मनाने की





नहीं रूठता अब दिल किसी से,
 ना चाहत है अब मनाने की, 

टुकड़ो में है अब जिंदगी,
 ना हसरत रही कुछ पाने की,

जी रहा हूँ सिर्फ जीने के लिए, 
आदत नहीं है हार जाने की,

है ख्याल अब भी कि कुछ तो होगा, 
जिंदगी यु ना चलती सबक बनाने की, 

क्या खोया क्या पाया, 
अब वक़्त कहाँ ये दांस्ता गुनगुनाने की ॥ 



Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Wednesday, 17 February 2016

देश में मौजूद है आतंकियों की बुद्धिजीवी ब्रिगेड ?



देश में जो आज हो रहा है वह एक खतरे की चेतावनी है। यह हमे सावधान करता है। हमे अपनी आँखे खोलने को मजबूर करता है कि आखिर देश में इतना हो-हल्ला जो मचा हुआ है क्यों ? यंहा पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि ये हो-हल्ला मचाने वाले कौन है ? कौन लोग है जो अपनी राजनीती चमकाने के लिए देशविरोधी ताकतों को नैतिक रूप से सहयोग कर रहे है ? सबसे बड़ी और अहम बात यह है कि बहस इस बात पर नहीं हो रही की ये कौन लोग है जो देश को टुकड़े में बाटने का नारा लगा रहे है ?  इसकी बर्बादी की कामना करते है। बहस इस पर हो रही है कि छात्र को गिरतार क्यों कर लिया ?

अब इस घटना क्रम को समझने की कोशिश करते है। 9 फरवरी को 2016 को जे एन यु में देश विरोधी नारे लगते है देश को तोड़ने की बात की जाती है। तब हमारे बुद्धिजीवी वर्ग में से किसी ने भी इसकी एक सुर में विरोध नहीं किया। न ही किसी विपक्षी पार्टी का इसमें कोई बयान सामने आया।  सभी लोग चुपचाप थे परन्तु जैसे ही केंद्र ने इस देशविरोधी गतिविधियों के पीछे किसका हाथ है जो लोग जे एन यु में देश विरोधी नारे लगा रहे थे। उन्हें ग्रिफ्तार किया। सभी बुद्धिजीवी वर्ग अपनी नींद से जाग गए। राजनीतिक पार्टियो की ब्यान बाज़ी शुरू हो गई। 

सभी पार्टियो के लोग चाहे वो आम आदमी पार्टी हो या कांग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टी या तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग अपनी नींद से जाग गए। सभी ने एक सुर में देश विरोधी लोगो का साथ दिया। राहुल ग़ांधी कहते है छात्रों को दबाया जा रहा है। केजरीवाल कहते है मोदी को छात्रों से पंगा महंगा पड़ेगा। ये किस प्रकार की राजनीती है ? जहाँ देश को गाली देने वालो पर, देश को तोड़ने वालो पर, सिर्फ इतना कह कर अपना पल्ला छाड़ लेते है कि हम ऐसी किसी भी घटना का समर्थन नहीं करते। जब समर्थन नहीं करते तो विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहा है ? उनके साथ जाकर फोटो क्यों ली जा रही है ? पुलिस को अपना काम करने दे अगर कोई निर्दोष है तो वह कोर्ट से छूट जाएगा। आप कोर्ट से बाहर ही अपनी जरूरत के अनुसार दोषी और निर्दोष साबित करने लगते है। 

ईशरत जहाँ का केस सबको याद होगा। कोई उसे शहीद बता रहा था तो कोई उसे बिहार की बेटी बता रहा था। तब यह बुद्धिजीवी लोग उसे के समर्थन में उतार आये थे परन्तु अंत में हुआ क्या ? उसकी असलियत सामने आई और वह आतंकी साबित हुई। पाकिस्तान की एक पत्रिका जो एक आतंकवादी संघठन चलता है ने ईशरत को अपना शहीद करार दिया था। लेकिन किसी बुद्धिजीवी ने इस पर कुछ नहीं बोला। 

हमारे देश का एक बहुत बड़ा बुद्धिजीवी बिका हुआ है और वह खबरों का व्यसायिकरण कर रहा है। देश की जनता को यह समझना होगा कि जब तक देश की जनता व्यक्तिगत स्तर पर इसका विरोध शुरू नहीं करेगी तब तक यह तथाकथित बुद्धिजीवी लोगो पर दबाव नहीं बनेगा। यह दबाव राजनितिक पार्टियो पर भी पड़ना चाहिए तभी ये पार्टिया देश विरोधी तत्वों को प्रोत्साहन देना बंद करेगी। 

Tuesday, 16 February 2016

कौन कहता है जेएनयू बुद्धिजीवियों का गढ़ है ?


जवाहर लाल यूनिवर्सिटी को भारत की बहुत ही अच्छी यूनिवर्सिटी में माना जाता है। सुनकर अच्छा लगता है। यंहा के विद्यार्थियों को किसी भी विषय पर बोलने और तर्क रखना सिखाया जाता है। सभी बातो को अगर एक पंक्ति में कहा जाए तो उन्हें नेता बनाया जाता है जो तार्किक हो। जे ऐन यु से बहुत ही बुद्धिमान लोग निकलते है जो आगे चलकर देश का अगल अलग स्तर पर नेतृत्व करते है, ऐसा तर्क दिया जाता है।  

उर्मिलेश उर्मिल एक वरिष्ठ पत्रकार है। आप जे एन यु के बारे में कहते है के यंहा से 2000  लोग अभी हाल ही में आईएएस बने है और आप सभी जे एन यु पर सवाल खड़ा कर रहे है ? यह तर्क इतना कमजोर है और साथ में यह हर भारतीय के लिए एक चेतावनी भी है। जरा सोच कर देखिये अगर इस तरह की विचार धारा वाले लोग इतने महत्वपूर्ण पदो पर जाते है तो भारत को कितना बड़ा नुक्सान पंहुचा सकते है ?

सवालो और आजादी की भी अपनी सीमा होती है। चलो एक सामान्य उदहारण से इसे समझते है। अगर कोई आपकी माँ को गाली दे और आपकी माता के सौ टुकड़े करने की बात करे तो आप उस पर क्या प्रतिक्रिया देंगे ? कुछ लोग कहते है यह उसकी आजादी है और वह आपके घर भी रहे और आप की बर्बादी के नारे लगाए और ऐसी ही कामना करे। तब आप क्या करेंगे ? ऐसा वह हर साल करे और वह आपको बर्बाद करने वालो का साथ दे। व्यवहार से नहीं तो विचार से। इसके सवाल जवाब को आप जे एन यु के सन्दर्भ में रख कर सोचिये। इसका उत्तर आपका अपना नजरिया ही तय करेगा।  

पहली बात जे एन यु पर और उसके सभी विधार्थियो पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है। सवाल उन पर उठाया जा रहा है जो 9 फरवरी को देश को तोड़ने और टुकड़े करने के नारे लगा रहे थे। कुछ विद्यार्थी और महानुभाव तर्क दे रहे थे कि पुलिस  की कैंपस में आकर इस तरह की कार्यवाही सही नहीं है। सीधे कैंपस में पुलिस की कार्यवाही गलत है। क्या जे एन यु इस देश का हिस्सा नहीं है ? जो पुलिस अपना कार्यवाही नहीं कर सकती। जे एन यु में इस तरह के कार्यक्रम पहले भी हुए है। तब पुलिस कार्यवाही नहीं हुई थी लेकिन उस समय आपने क्या कदम उठाए थे कि ऐसा दुबारा न हो। इस तरह का आयोजन तीसरी बार हुआ है और हर साल होता है। उमर खालिद जो इस कार्यक्रम का आयोजक था। इसके तीसरे साल सफलतापूर्वक होने के लिए अपने साथियो को बधाई देता है। तब यूनिवर्सिटी प्रशासन ने क्या किया ? इसका जवाब तलाशिये आप खुद जो लोग पुलिस कार्यवाही पर सवाल उठा रहे है। उन से भी पूछिये।  

Saturday, 13 February 2016

राष्ट्रप्रेम बने देश का धर्म ?


अभी हाल के दिनों में जो घटनाए इस देश में हो रही है। वह  विचलित करती है और एक भारतीय को दुःख और क्रोध से भर देती है।  जेएनयु की स्थापना 22 अप्रैल 1969 को हुई थी और इसे हमारे देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में गिना जाता है। जेएनयु केंद्र सरकार के अनुदान से चलती है। लम्बे अरसे तक यंहा पर वामपंथी विचारधारा का बोलबाला रहा है। 

9 फरवरी को जेएनयु में देश विरोधी नारे लगे। भारत को 100 टुकड़ो में तोड़ने की बात हुई। इस कार्यक्रम के आयोजक उमर खालिद है। इसका AISA के छात्र अध्यक्ष कह्नैया कुमार ने भी न केवल समर्थन किया बल्कि उसमे देश विरोधी नारे भी लगाए। यह संघठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया का छात्र संघठन है। सीपीआई नेता डी. राजा की बेटी भी इस देश विरोधी कार्यक्रम में शामिल थी और उसका वीडियो भी उपलब्ध है। 

जब उमर खालिद से इसका का कारण पूछा की सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर आप एक आतंकवादी की बरसी क्यों माना रहे थे ? और देश विरोधी नारे जैसे- कितने अफजल मरोगे हर घर से अफजल निकलेगा, हिंदुस्तान की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी, क्यों लगा रहे थे ? उसपर उसका उत्तर चौकाने वाला था। कहता है यह कौन तय करेगा कि अफजल आतंकवादी था या नहीं ? कुछ नेता या जज मिलकर यह निर्णय कैसे ले सकते है ? 
उसने अपने बांटे हुए सांस्कृतिक पम्पफ्लेट पर अफजल गुरु की फांसी को न्यायिक हत्या करार दिया है। उसको भी उसने न्यायोचित ठहराया है। 

कह्नैया कुमार से जब पत्रकार ने पूछा कि शिक्षा के मंदिर में देश विरोधी नारे लगाना शोभा नहीं देता है। तो वह कहता है कि "आप इसे मंदिर न कहे, शिक्षण संस्थान कहे"। इस एक पंक्ति ने ही इन सबकी राष्ट्रविरोधी विचार धारा को प्रदर्शित कर दिया है। जब पत्रकार कहता है कि आप भारत माता की जय बोलो, तब वह इधर- उधर की बात करने लग जाता है परन्तु भारत माता की जय नहीं बोलता । जब यह लोग विचार ही राष्ट्रविरोधी रखते है तो इनसे राष्ट्रहित के व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती। 

इस मुद्दे पर कांग्रेस, सीपीआई , समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, जनता दल युनाईटेड, राष्ट्रीय जनता दल, आम आदमी पार्टी  में से किसी भी  नेता का ब्यान नहीं आया। हर मामले में घुसने वाले केजरीवाल का भी अब तक कोई ब्यान नहीं आया था परन्तु जब आया तब कहते है "मोदी सरकार निर्दोष छात्रों को निशाना बना रही है।"

सभी पार्टियों का राजनीतक चरित्र इस घटना ने सबके सामने ला दिया है। ये सब पार्टिया वोट के लिए देशविरोधी ताकतों का नैतिक रूप सें समर्थन कर रही है । 

मै  देश की जनता से पूछना चाहता हूँ। कहाँ  है वे सब लोग जो धर्म के नाम पर सड़को पर उतर आते है ? मेरे धर्म का अपमान कर दिया, मेरे पैगम्बर को गाली दे दी। ये कर दिया, वो कर दिया। देश में अराजकता फैलाते है। लेकिन जब देश को गाली दी जाती है तो घरो में दुबके रहते है। 

तुम्हारे देश को कोई गाली दे। उसके 100 टुकड़े करने की बात कहे। उसकी बर्बादी की कामना करे। इतने पर भी तुम्हारा खून न खोले ? तो क्या वह सच्चा भारतीय हो सकता है ? इस पर मुझे कुछ पंक्तिया याद आती है --
"जिस भारतीय का खून न खोले, खून नहीं है वह पानी है,
जो देश के काम ना आए, वो बेकार जवानी है॥"  
 इसलिए इस देश का एक ही धर्म होना चाहिए "राष्ट्रप्रेम" ।

Read Also:- इशरत को बेटी कहने वालो की बोलती बंद

Friday, 12 February 2016

इशरत को बेटी कहने वालो की बोलती बंद



डेविड कोलमन हेडली ने इस बात कि पुष्टी कर दी है की इशरत जहा एक महिला आतंकवादी थी। वह एक फिदाईन हमलावर थी।  यह बात गुजरात पुलिस ने  बार-बार कही थी।  साथ में ही भारत की केंद्रीय एजेंसी (आईबी) ने भी इस बात की पुष्टि की थी। फिर ऐसा क्या हुआ भारत सरकार और गैर भाजपा सरकार इस राज्य स्तरीय मुददे को केंद्र में ले आई । गुजरात में विपक्ष में बैठी कांग्रेस इस मुददे को उठाए समझ में आता है लेकिन केंद्र में बैठी कांग्रेस की भारत सरकार ने भी इसे अपना मुख्य मुद्दा मान लिया जबकि उनके पास आईबी की रिपोर्ट थी। उस समय भाजपा को और मोदी को बदनाम करने के लिए देश की शांति और सुरक्षा के साथ समझोता किया जा रहा था, केवल वोट बैंक के लिए। मान सकते है पुलिस गलती कर सकती है, यह भी मान सकते है कि राज्य सरकार गलती कर सकती है परन्तु बिना जाँच किये ही उसे शहीद बताने लगे, कोई उसे निर्दोष बता रहा था तो कोई उसे बिहार की बेटी बता रहा था तो कोई सेकुलरिज्म का रोना रो रहा था। अब वह हर स्तर पर दोषी साबित हो चुकी है। आतंकवादियों को चाहने वाले इस बात को अब कितना ही लम्बा खिचे और इस पर अब उट पटांग तर्क दे। देश की जनता अब समझ चुकी है। लेकिन कुछ लोगो की बेशर्मी देखिये अभी भी अलग अलग तर्कों से उसे न्याययोचित ठहरहा रहे है। 




वोट बैंक की राजनीती ने कांग्रेस के  नेताओ को इतना निचे गिरा दिया है कि  जब पी चिदंबरम गृह मंत्री थे, भारत सरकार के । उस समय ग्रह मंत्रायलय ने कोर्ट में अफेडफिट दिया था।  जिसमे इशरत जंहा को आतंकवादी माना था।  बाद में अफेडफिट बदल दिया । 18 फरवरी को 2013 में एनआईए ने भी अमेरिका जा कर इस बात की पुष्टी  की थी और तब भी हेडली ने इशरत को आतंकवादी बताया था। लेकिन तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और कांग्रेस ने इसे कैसे भुनाया यह सभी जानते है। आईबी ने सीबीआई को 28 फरवरी 2013 को एक रिपोर्ट दी।  जिसमे हेडली ने ऍफ़बीआई को बताया था कि इशरत जहा लश्करे-तोयबा की महिला सुसाइड बॉम्बर है।  जिसे मुज्ब्बिल ने भर्ती किया था जो कि पाकिस्तान आधारित लश्करे-तोयबा  का कमांडर है।" 


Thursday, 11 February 2016

जेएनयू बनता जा रहा है देशद्रोहियो का अड्डा ?




कुछ दिनों पहले जब सुब्रमण्यम स्वामी ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी ( जे एन यु ) पर कहा की " जे एन यु के विद्यार्थी और अध्यापक नक्सली है और यंहा पर बीएसऍफ़ को तैनात कर देना चाहिए" । उनके इस बयान  पर अन्य विपक्षी दलों  की टिप्णी बिना देर किये आई परन्तु 9 फरवरी 2016 को जे एन यु में अफजल गुरु की बरसी मनाई गई। पाकिस्तान जिंदाबाद , लड़कर लेंगे आजादी , कश्मीर मांगे आजादी, कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा , जैसे नारे लगे परन्तु किसी भी विपक्षी पार्टी के नेता ने इस पर कोई बयान नहीं दिया। 

अब सवाल उठता है जे एन यु  में ये भारत विरोधी नारे लगते रहे तो वंहा के अधिकारी  क्या कर रहे थे ।  जे एन यु  के वाइस चांसलर ने क्या कदम उठाए। क्या इतना कह देना काफी है कि अनुमति सांस्कृतिक  कार्यक्रम के लिए ली थी इसलिए पता नहीं था जैसे ही पता चला कार्यक्रम रद्द कर दिया। इस कार्यक्रम का आयोजन करने वाले विद्यार्थी अभी भी खुले घूम रहे है और कार्यक्रम सफलता पूर्वक आयोजित करने के लिए एक दूसरे को बधाई दे रहे है। क्या इन विद्यार्थियों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं होनी चाहिए ? क्या यह कार्यक्रम पहली बार मनाया गया है? नहीं, ऐसे कार्यक्रम जेएनयु में पहले भी होते रहे है लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि ये बात इस स्तर पर जनता के सामने आई है। 

Tuesday, 9 February 2016

बुर्ज खलीफा भी बौनी होगी इस इमारत के सामने



दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बुर्ज खलीफा जो दुबई में है। वह भी बौनी होगी इस इमारत के सामने जी हाँ आपने सही पढ़ा। जापान बनाने जा रहा है दुनिया की सबसे ऊँची इमारत।  जिसका नाम होगा स्काई मील टॉवर। इसकी ऊंचाई मौजूदा दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बुर्ज खलीफा से दोगुनी होगी। बुर्ज खलीफा की ऊंचाई 828 मीटर है और स्काई मील टावर की ऊंचाई होगी 1700 मीटर होगी। इसका निर्माण जापान की खाडी क्षेत्र के पास नेक्स्ट टोकियो के नाम से मेगा सिटी में होगा। टोकियो की खाड़ी जापान का बड़ा औद्योगिक  क्षेत्र है। क्या- क्या खासियतें होगी इस इमारत में आइये जानते है---

विशेषताए -  

इमारत की उचाई 1700 मीटर है। स्काई मील का आकर षट्कोणीय ( छ कोण वाला ) है। जो इससे ऊँची इमारतों में होने वाले किसी भी हवा के दबाव को सहने की क्षमता देता है। यह सब, लैब में इंजीनियरनो ने परीक्षण किया है। इस इमारत में 55000 हजार लोगो को बसने की योजना है। इसके साथ इमारत में शॉपिंग मॉल, जिम  व अन्य आधुनिक सुविधाए होगी। इस इमारत में अनोखी लिफ्ट भी होगी जो बिना केबल के चलेगी। यह लिफ्ट ऊपर नीचे तो चलेगी ही परन्तु दाए बाए भी चलेगी ताकि लोगो को पैदल न चलना पड़े। इस इमारत के पास कृत्रिम द्धीप भी बसाए जाएगे जो 150 से 1500 मीटर तक के होगे जो की टोक्यो को बाढ़ से बचाएगे। दैनिक जागरण के अनुसार इन पर पांच लाख लोगो को बसाने की भी योजना है। इमारत में ऊर्जा के लिए सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके साथ ही इमारत की छत पर खेती करने की भी योजना है।  


 

Saturday, 6 February 2016

क्यों करते है लोग मुस्लिमो पर शक ?




आपको ये शीर्षक देखकर थोड़ा अजीब लगा होगा या ये कहे आप सेक्युलर और नॉन सेक्युलर के खेल में पड़ गए होगे। हो सकता है किसी को ये शीर्षक ही सांप्रदायिक लगा हो या हो सकता है किसी को ये पढ़कर अच्छा लगे तो कोई पसंद करने के बाद भी ये सोचे की इसे शेयर या लाइक करू या न करू। अगर करुगा तो कोई मुझे सांप्रदायिक ना कह दे। हालांकि मै यंहा ऐसा कुछ नहीं करने जा रहा हूँ। जिससे किसी की भावनाओ को ठेस पहुंचे लेकिन इन सबके बावजूद मेरे कुछ सवाल है, जो मै सभी से पूछना चाहता हूँ और ये सवाल उनसे भी है जो सवाल पूछते है ओर उनसे भी जो उनका जवाब देते है और उन सभी से भी जो उन सवालो-जवाबो के बीच अपनी राय देते है और आम जनता से भी जो राय सुनकर अपनी राय बनाती है और चुनाव के दौरान वोट से अपनी राय रखती है। 


आप सभी आतंकवादी शब्द से परिचित होगे लेकिन ये आतंकवादी कौन होते ? किस धर्म के होते है ? या यु कहे कि वास्तव में आतंकवादियों की श्रेणी में कौन आता है ? देखा जाए तो ये आतंकवादी शब्द ही क्यों इस्तेमाल किया गया, कुछ लोगो के लिए ? वैसे आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता है। ये पँक्ति आप सभी ने नेताओ से कई बार सुनी होगी। ये सत्य भी है परन्तु अधूरा। अधूरा इसलिए क्योकि नेता लोग धर्म को देख कर ही आतंकियों का धर्म बताते है।