Tuesday, 28 March 2017

वीर विक्रमादित्य


बड़े ही शर्म की बात है कि महाराज विक्रमदित्य के बारे में देश को लगभग शून्य बराबर ज्ञान है, जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था, और स्वर्णिम काल लाया था
उज्जैन के राजा थे गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी , सबसे बड़ी लड़की थी मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा वीर विक्रमादित्य…
बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पदमसैन के साथ कर दी , जिनके एक लड़का हुआ गोपीचन्द , आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , फिर मैनावती ने भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली।

आज ये देश और यहाँ की संस्कृति केवल विक्रमदित्य के कारण अस्तित्व में है अशोक मौर्य ने बोद्ध धर्म अपना लिया था और बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था, देश में बौद्ध और जैन हो गए थे।

रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया। विक्रमदित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा, जिसमे भारत का इतिहास है अन्यथा भारत का इतिहास क्या मित्रो हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे, उस समय उज्जैन के राजा भृतहरि ने राज छोड़कर श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , राज अपने छोटे भाई विक्रमदित्य को दे दिया , वीर विक्रमादित्य भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से गुरू दीक्षा लेकर राजपाट सम्भालने लगे और आज उन्ही के कारण सनातन धर्म बचा हुआ है, हमारी संस्कृति बची हुई है


महाराज विक्रमदित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है। विक्रमदित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमदित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे , आप गूगल इमेज कर विक्रमदित्य के सोने के सिक्के देख सकते हैं।

हिन्दू कैलंडर भी विक्रमदित्य का स्थापित किया हुआ है-


आज जो भी ज्योतिष गणना है जैसे , हिन्दी सम्वंत , वार , तिथीयाँ , राशि , नक्षत्र , गोचर आदि उन्ही की रचना है , वे बहुत ही पराक्रमी , बलशाली और बुद्धिमान राजा थे ।
कई बार तो देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे , विक्रमदित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे, न्याय , राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था विक्रमदित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी।

पर बड़े दुःख की बात है की भारत के सबसे महानतम राजा के बारे में इतिहास भारत की जनता को शून्य ज्ञान देता है,

कृपया आप शेयर तो करें ताकि देश जान सके कि सोने की चिड़िया वाला देश का राजा कौन था

प्रतिलिपी...

यह मंदिर बिकाऊ है...



एक तरफ देश में राम मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा व साधु-संत आंदोलनरत हैं। वहीं दूसरी ओर मयूर विहार फेस-1 की हरिजन बस्ती में साध्वी ने मंदिर के बाहर ‘यह मंदिर बिकाऊ है’ का बोर्ड़ लगा दिया है। हालांकि अभी तक उन्हें कोई खरीदार नहीं मिला लेकिन जिसने भी यह सुना वह जिज्ञासा वश मंदिर की ओर बढ़ चला। पुलिस भी स्थिति पर नजर बनाए हुए है।

शकुंतला देवी (साध्वी) 2010 से हरिजन बस्ती में रह ही हैं। उन्होंने अपने मकान को ही मंदिर का रूप दे दिया है। इसी को लेकर कुछ असामाजिक तत्व साध्वी को तभी से तंग करते हैं। कभी मंदिर पर अंडे मारते हैं तो कभी मांस के टुकड़े फेंक दिये जाते हैं। उन्हें आस-पास की दुकान से सामान भी लेने नहीं दिया जाता। कुछ लोग उन्हें पलायन करने के लिए दबाव ड़ाल रहे हैं। इसी से तंग आकर साध्वी ने मंदिर के ऊपर मंदिर बिकाऊ का बोर्ड लगा दिया है।

साध्वी ने बताया कि वे धमकी देते हैं कि अगर कोई बाहर से यहां पुजा करने के लिए आया तो उसे पिटा जाएगा। वहीं स्थानीय बीएसपी नेता भी उन पर पलायन के लिए दबाव बना रहे हैं।   
अब्दुल जब्बार अंसारी जो एक सामाजिक कार्यकता हैं ने बताया कि हमारे यहां ऐसा कोई विवाद नहीं है। यहां सभी लोग मिलजुलकर रहते हैं। हां अगर किसी बच्चे ने कुछ कह दिया हो तो मैं कुछ नहीं कह सकता। आगे वह कहते हैं कि बिलाल जो अमन कमेटी के अध्यक्ष हैं ने ही मंदिर पर रंग करने के लिए पेंट दिया था। उसी तरह हमारे हिन्दू भाइयों ने भी मस्जिद बनाने के लिए 20 किलो सरिया दिया।

मौके पर मौजूद ए.एस.आई एस.एस नेगी के मुताबिक हम स्थिती पर नजर बनाए हुए हैं और पुलिस प्रशासन की तरफ से साध्वी को 24 घंटे सुरक्षा प्रदान की गई है।  
स्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने वहां पर आर.ए.एफ की तैनाती भी कर दी है। 

Tuesday, 21 March 2017

पूर्वाग्रह...


आज मैं ये जानना या समझना नहीं चाहता कि उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री कैसा रहा है अपने भूतकाल में, मैं ना उन्हें सही ठहराना चाहता हूं नहीं गलत। क्योंकि समय,देश, काल पर हमारे कर्म निर्भर करते हैं। एक ही कर्म को जब हम सभी जगह लागु करना चाहते है तो हम गलती करते है। हम यह माने या ना माने यह हमारी बोद्धिक क्षमता पर निर्भर करता है कि हम किसी के बारे में क्या विचार रखते है। क्या हमने उसके बारे में जानना चाहा या नहीं या फिर कुछ लोगो ने हमारे सामने एक तस्वीर पेश की और हमने उसे सच मान लिया ? क्या हमने खुद उस तस्वीर की सच्चाई जाननी चाही है। कोई ऐसा है वैसा हैं हम सब ऐसी बात करते है, लेकिन क्यों है क्या हमने कभी जानने की कोशिश की , नहीं की? 


हम अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा पूर्वाग्रह में बिता देते है। हम चीजों को जानने-समझने की कोशिश ही नहीं करते। यह समस्याए पैदा करता है। 
खैर मैं यह आशा जरुर करता हूं योगी आदित्यनाथ जी मुख्यमंत्री के पद पर रहते हूए दो चीजो की तरफ पहले प्राथमिकता देगे- पहली कानून व्यवस्था, दूसरी आधारभूत सुविधाएं। धन्यवाद


Thursday, 9 March 2017

पूरक बनें स्त्री-पुरुष विरोधी नहीं



8 मार्च को हमने विश्व महिला दिवस मनाया इस बार का थीम रखा गया ‘बी बोल्ड फॉर चेंज’ यानी बदलाव के लिए बहादूर बने। ये देख कर, सुनकर अच्छा लगता है। वाह कितना अच्छा काम हो रहा है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि बाकी दिन क्या होता है? क्या, जिस बदलाव की बात हम करते है या पूरी दुनिया करती है, क्या वह हो रहा है? अब कुछ लोग कहेगे कि बदलाव एक दिन में नहीं आता। सही बात है, मैं भी मानता हूं बदलाव एक दिन में नहीं आता। यह एक सतत और लम्बी प्रक्रिया हैं। पर बात यह है कि हम किस बदलाव की बात कर रहे है? हम समाज में महिलाओं किस स्थान पर देखना चाहते हैं? बदलाव या बराबरी के मायने क्या हैं?  क्या हम यह जानते है या सिर्फ एक रटी-रटाई बात को बरसों से दोहराए जा रहे है- महिलाओं को सम्मान मिलना चाहिए, सरकार में और समाज में महिलाओ की उचित भागीदारी होनी चाहिए। क्या हम वह भागीदारी उनको दे रहे है या हमने सच में वो हिस्सेदारी उनको देने की कोशिश की है? अगर की है तो क्या कारण है कि महिला आरक्षण बिल आज तक संसद में पारित नहीं हो पाया है। 1996 में इसे पहली बार संसद के पटल पर रखा था लेकिन अब तक किसी न किसी कारण से यह पास नहीं हो पाया है। वैसे अगर यह पास हो जाता है तो कहीं इसका वही हाल न हो जो ग्राम पंचायत में चुनी हुई महिला प्रधान का होता। कागजो में तो प्रधान महिला होती हो लेकिन असल में प्रधानी उसका पति कर रहा होता है।


दुनिया के किसी और हिस्से की बात मैं नहीं कहना चाहता लेकिन अगर बात मैं भारत की करुं तो बराबरी के नाम पर हम आज महिलाओं को दिखावटी वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझते । आप विज्ञापन ही देख लिजिए। हर विज्ञापन में महिला की भूमिका किसी दिखावटी वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं होती चाहे सेविंग क्रिम की एड़ हो या बनियान की, महिलाओ को किस तरह से प्रदर्शित किया जाता है सब जानते हैं। अगर हम प्राचीन समय की बात करे तो कैकेयी से लेकर रानी लक्ष्मीबाई तक, सभी महिलाए किसी न किसी विशेष कला में प्रवीण थी।  समाज  हो या राजनीति वह अपना एक विशेष स्थान रखती थी। लेकिन पश्चिम की नकल करते-करते आज हम स्त्री को बराबरी का हक देने के लिए भी उसी पश्चिम की नकल कर रहे है जहां खुद स्त्रियों को अधिकार 20वीं शताब्दी में मिलें। अमेरिका जिसे दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र माना जाता है, वहां भी अभी तक किसी महिला राष्ट्रपति को नहीं चुना जा सका। जबकि भारत में इंदिरा गांधी कई बार प्रधानमंत्री बन चुकी थी। इसलिए महिलाओं को हक और अधिकारों के मामले में हमें किसी की नकल करने के बजाए भारतीय संस्कृति के दायरे में चलना चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि महिलाएं कुछ न करे बल्कि मैं यह कह रहा हूं कि महिलाएं चाहे तो क्या नहीं कर सकती। वह हर काम कर सकती है जो एक आदमी कर सकता है लेकिन जो एक आदमी नहीं कर सकता, वह काम वह सबसे अच्छा कर सकती है। इसलिए आदमी औरत बराबरी के नाम पर दो खेमों में बाटने के बजाए एक दूसरे का पूरक बनाना चाहिए जो भारतीय संस्कृति है। अगर महिला कुछ करना चाहती है तो उसे करना चाहिए उसे कोई रोके नहीं लेकिन अगर वह काम नहीं करती और हाउस वाइफ है, तो इसका मतलब वह, वह काम करती है जो दूनिया में सबसे अधिक मुश्किल है, एक मकान को घर बनाना। यह किसी वैज्ञानिक, इंजीनियर, आर्केटेक्ट आदि से ज्यादा मुश्किल काम हैं।  जो एक आदमी चाहे तो नहीं कर सकता। उसके अंदर वह सहनशीलता सबकी देखभाल व प्रबंधन नहीं है जो एक स्त्री को सहज ही आता है। हमने कभी न कभी यह जरुर सुना होगा कि घर को घर स्त्री ही बनाती है। यह पुर्णत: सत्य है। स्त्री-पुरूष एक दूसरे के पूरक है जो एक दूसरे की कमियों को पूरा करते है। खामियों को दुरुस्त करते है। शायद भगवान शंकर ने यही सोचकर अर्धनारीश्वर का रूप धरा था ताकि सभी को स्त्री-पुरुष की बराबरी का संदेश दे सके। लेकिन आज बराबरी के नाम पर समाज को स्त्री-पुरूष दो खेमों में बांट दिया है। बराबरी का मतलब सिर्फ एक ही अर्थ लिया जाता है आज के दौर में, पुरूष जो कुछ कर सकता है और करता है वहीं सब अगर स्त्री करें तभी समानता कही जा सकती है। यह बराबरी का अधिकार नहीं है यह तो कोरी नकल का अधिकार है। दोनों (स्त्री-परुष) के अपने गुण है, अपनी सीमाएं है लेकिन आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में हम सिर्फ इन्हें एक-दुसरे के खिलाफ खड़ा करते दिखाई देते है और कुछ नहीं।