Saturday, 31 October 2015

आज नम है आँख मेरी, मेरे देश की हालत पर





मित्रो इस कविता के माद्यम से जो मैंने महसूस किया था। वह कहने का मैंने प्रयास किया है | ये सब हर भारतीय ने कभी न कभी तो महसूस किया ही होगा के जो सरहद पर अपनी जान की बाज़ी लगा कर हमारी रक्षा करते है , उनके साथ हम क्या करते है। क्या हो जाता है हमारे देश के नेताओ को जब कोई शहीद होता है तो कितने पैसे हम उनको देते है ताकि उनके जाने के बाद उनका परिवार चैन से रहे। जब कोई खिलाडी जीत के आते है तो करोडो उनको बाटने लग जाते है, प्रतिस्पर्धा होने लग जाती के कोन कितना पैसा देता है। पर जब कोई शहीद होता है तो कहा चला जाता है इनका पैसा ? और भी काफी कहने का प्रयास किया है मैंने इसमें आशा करता हूँ आपको मेरा ये प्रयास पसंद आएगा ।

Wednesday, 14 October 2015

हिंदुस्तान में हिन्दुओ के साथ दोहरा रवैया.......


दादरी हत्या कांड ने देश में ही नहीं विदेशो में भी काफी सुर्खियां बटोरी, जो घटना घटी उसे किसी भी सूरत में सही नहीं ठराया जा सकता इस में कोई दोराय नहीं है। इस हत्या काण्ड के ऊपर काफी लिखा गया और टीवी डिबेट की भरमार हो गई लगता था, जैसे देश में सभी मुद्दे इस घटना के आगे गोण हो गए हैं और हमारे देश में बस एक यही घटना एेसी हुई है, जो दुनिया के किसी मुल्क में नहीं हुई। टीवी चेंनलो पर बुद्धि जीवी आकर अपने आपको सेकुलरिज्म का सबसे बड़ा रक्षक बताने और इस “कौन बनेगा सबसे बड़ा सेक्युलर” के खेल में विजयी होने के गम्भीर प्रयास को दिखाने का मौका वह छोड़ना नहीं चाह रहे थे। और कोई-कोई तो अपने को सेक्युलर दिखने के चक्कर में हिन्दू कट्टरवाद, भगवा आतंकवाद का बखूबी इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि पूरी दुनिया में 99.9% आतंकवादी घटनाए हो रही है और इन को करने वाले किस धर्म के ये भी सभी जानते है। पर तब धर्म का न कोई रंग होता है न मजहब, ये सोचने वाली बात है।

Thursday, 8 October 2015

ईश्वर केसे करते है बुराई ( ISIS ) का अंत ?



जैसे चुम्बक और लोहे का रिश्ता होता है उसी तरह से आज के सन्दर्भ में ISIS और बुराई एक दुसरे के पूरक बन गये है। दुनिया भर के देशो से जवान लड़के लडकिया ISIS में शामिल हो रहे है और सभी देशो की सरकारों के चेहरे पर इसे देख कर चिंता की लकीरे आ गई है, जो कि मेरी समझ से परे है। कुछ विद्वान इसे ISIS का जादू मानते है और कहते है कि ISIS युवाओ का ब्रेन वाश कर रहा है और उन्हें पश्चिमी देशो के खिलाफ भड़का रहा है। लेकिन मेरी राय में “जंहा खड्डा होता है पानी वही भरता है” सनातन धर्मं में और उसके माने वालो में ये चार पक्तिय बहुत प्रसिद्ध है कि 

“ दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान, साईं दया न छाडिये जब तक घट में प्राण”

शिक्षित चाहिए या साक्षर ?






ये सुन कर बहुत दुःख हुआ के एक बच्चे ने सिर्फ इसलिए आत्महत्या करली क्योकि वह स्कूल की फीस नहीं दे सका। ये बहुत दुःख और शर्म की बात है कि जिस शिक्षक पर बच्चो के भविष्य का दारोमदार है। वो सिर्फ छात्र को इसलिए मारता है कि उसके पास देने के लिए पुरे पैसे नहीं है। जबकि वह 5000 दे चूका था और सिर्फ 1000 रुपए बाकि थे। ये बात सिर्फ यही ख़त्म नहीं होती और ये सिर्फ आत्महत्या का मामला ही नहीं है। ये मामला विद्यालयों में नियुक्त होने वाले शिक्षको का भी है। जिन बच्चो पर  देश का भविष्य टिका है उन्हें क्या बनाना है और वे क्या बन सकते है ये सब एक शिक्षक ही देखता है, परखता है क्योकि विध्यार्थी जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा वह विध्यालय में बिताता है इसलिए वो शिक्षक कितना शिक्षित है या वो सिर्फ साक्षर है और उसकी नियुक्ति का क्या प्रक्रिया है। हमे इस पर भी विचार करना चाहिए। हमे इसका हल हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति से मिलेगा। जहाँ राजा का लड़का हो या किसी गरीब किसान का या कोई ब्राह्मण सबको शिक्षा के लिए एक नियम थे। कोई बड़ा छोटा नहीं था और राजकुमार भी अपने शिक्षण काल में भिक्षा माग कर शिक्षा लेते थे। यह सब किस लिए था ताकि वह सब जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयों का सामना कर सके बिना डरे बिना थके। और जीवन की कठिनाइयों को समझ सके तथा अपने शासन को उस गरीब आदमी की समस्याओ को समझते हुए चलाए। और एक अच्छा शासक बनने से पहले एक अच्छा इंसान बने।