Sunday, 27 March 2016

कोई दर्द देख बढ़ता है आगे




कोई दर्द देख बढ़ता है आगे, कोई दर्द में भी देखता है फायदे,
कोई छोड़ देता है रोता  किसी को, 

कोई लेता है चित्र, ओर  बेचता किसी को,

कोई उठाता है रोते हुए को, कोई छोड़ता है रोते सभी को, 

ये दुनिया के दस्तूर, ये दुनिया की बाते, 
कोई ढूंढ लेता है, इसमें भी खुद को॥  



Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Wednesday, 9 March 2016

आतंकियों को मकबूल बट याद है, क्या आपको रविन्द्र म्हात्रे याद है ?


पुणे मे हर दिन हजारों वाहन "म्हात्रे" पुल से गुजरते हैं लेकिन उन मे से शायद 10% लोग भी नही जानते होंगे कि ये म्हात्रे कौन थे।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मे कुछ बुद्धिजीवियों ने कुछ दिन पहले प्रदर्शन किये और अफजल गुरु और मकबूल बट को शहीद कह कर घोषणाएं की।

मकबूल बट को सामान्य जनता भूली होगी मगर ऊग्रवादी भूले नही।  कश्मीर घाटी के पुराने हिंन्दू जो भट्ट थे वही धर्मपरिवर्तन के बाद बट हो गये थे।

14 सितंबर 1966 को पाकिस्तान की सहायता से इस मकबूल बट ने पुलिस बल पर हमला किया जिस मे इंन्स्पेक्टर अमरचंद मारे गए।  1971 के विमान अपहरण कर लाहोर ले जाने मे भी इस मकबूल बट की मुख्य भूमिका थी।  तब यह पाकिस्तान मे रहता था।

1976 मे भारतीय सेना ने पकडा और फिर इसे फांसी की सजा हुई। उसने भारत के राष्ट्रपती से क्षमा याचना की।

3  फरवरी 1974  को इसके साथियों (Jammu Kashmir Liberation Front) ने लंडन मे भारतीय उच्चायोग के श्री रवींद्र म्हात्रे का अपहरण किया।  श्री म्हात्रे अपनी छोटी सी बेटी के जन्म दिन का केक ले कर घर आ रहे थे और बस से उतरे थे। यहीं से अपहरण कर आतंकियों ने मकबूल बट को रिहा करने की मांग की।

तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने यह मांग नही मानी और स्पष्ट कर दिया कि भारत सरकार आतंकियों से कोई बातचीत नही करेगी। तब 6 फरवरी 1984 को इन आतंकियों ने श्री म्हात्रे का कत्ल कर उनके शव को सडक पर फेंक दिया।

तब श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपती श्री जैल सिंह को दया याचना को  नामंजूर करने की सिफारिश की, 5 दिन बाद 11 फरवरी 1984 को मकबूल बट को फांसी पर चढा दिया।

रवींद्र म्हात्रे के बूढे माता-पिता मुंबई के विक्रोळी मे 3 कमरे के मकान मे रहते थे।

 श्रीमती गांधी उन्हे मिलने मुंबई गईं और हवाई अड्डे से सीधे विक्रोळी गईं।  म्हात्रे के बूढे पिता का हाथ 15 मिनट हाथ मे लेकर बैठीं और सांत्वना दी।  दोनो की आंखों मे पानी था।  श्रीमती गांधी ने देश को महत्व दिया था जिस से म्हात्रे को जान गवानी पडी।  इस के लिये खुद को दोषी मान कर क्षमा मांगी और सीधे हवाई अड्डे से दिल्ली वापस आईं।

4 नवंबर 1984 को इन्ही आतंकियों ने मकबूल बट को फांसी की सजा देने वाले जज "नीलकंठ गंजू" की हत्या कर दी.

ये आतंकवादी 30 साल बाद अभी भी मकबूल भट को भूले नही मगर हम श्री रवींद्र म्हात्रे को भूल गए....

चलिये हम आज उन्हे, श्री म्हात्रे, नीलकंठ गंजू और इंस्पेक्टर अमरचंद को याद कर अपनी श्रद्धांजली दें.

#प्रतिलिपि   

Tuesday, 8 March 2016

थियानमेन चौक नरसंहार


एक छात्र आंदोलन चीन में भी हुआ था 3-4 जून 1989 को, जिसे दुनिया थियानमेन चौक नरसंहार  के नाम से जानती है..
उस आन्दोलन में चीनी छात्र लोकतंत्र, आजादी के समर्थन में नारे लगाते-लगाते इतने ज्यादा जोश में आ गए कि चीन विरोधी नारे लगाने लगे.. वो थे चीन-राष्ट्र की संप्रभुता के विरुद्ध नारे बुलंद करने वाले "छात्र".. "आदर्श लिबरल छात्र.." जो चीन का ही अनाज खाते हुए भी उस की मिट्टी से ग़द्दारी कर रहे थे.. उस देश की नीतियों को चुनौती दे रहे थे.. उस देश की बर्बादी के तराने गा रहे थे..!

लेकिन तब इस पर पुलिस ने उनको गिरफ्तार नही किया..बल्कि उनको लाइन में खड़ा करके चीनी सेना ने सीधे उन पर तोप के गोले दागे थे......पूरे थियानमेन चौक को टैंकों से घेर कर गोलों से उड़ा दिया था.. पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने !

हालांकि तब इस घटना की दुनिया भर में "कड़ी निंदा" हुई थी ,,
लेकिन चीन की सरकार ने कहा था हम देशद्रोहियों से ऐसे ही निपटेंगे, ताकि अगली बार देश के विरुद्ध बात तो क्या सोचने वालो की भी रुह कांप जाए... बाकी दुनिया को जो करना है कर ले...
दुनिया चिल्लाती रह गई.. पर चीन ने अपने विरुद्ध सर उठाने वाले एक भी "तथाकथित छात्र" को जीवित नहीं छोड़ा.. !   

नतीजा..????
चीनी छात्र आज अनुशासित है,, डॉक्टर, इंजीनियर बन अपना और अपने देश का नाम रोशन कर रहे है..!!!

Thursday, 3 March 2016

मेरा कसूर बस इतना कि मैंने ब्राह्मण जाति में जन्म लिया ?


लवकेश बीटेक का छात्र था जिसने अभी कुछ दिनों पहले आत्महत्या कर ली। वह जाति से ब्राह्मण था। आप सोच रहे होगे यह ब्राह्मण है। यह बताने की आवश्यकता क्या थी ? यहाँ लवकेश की जाति बतानी बेहद जरुरी थी क्योकि यह बीजेपी के लिए राहत की बात होगी कि आत्महत्या करने वाला एक ब्राह्मण था। अगर गलती से यह दलित होता तो देश के राजनैतिक माहौल में तूफ़ान आ जाता। जँहा बीजेपी के लिए यह राहत की खबर है वही कांग्रेस, मीडिया हाउसेस और कुछ तथाकथित सेक्युलर और बुद्धिजीवियों के लिए बुरी खबर है। क्योकि उनके हाथ से सरकार को घेरने का मौका निकल गया। अभी संसद का सत्र चल रहा है इसलिए यह संसद को ठप्प करने का सबसे जानदार मुददा था क्योकि जिन मुददो पर संसद को ठप्प किया जा रहा है, वह सब बहाने है।

लवकेश की आत्महत्या एक नहीं कई सवाल खड़े करती है। शिक्षक पर भी और शिक्षण पर भी। इसके साथ साथ उन राजनेताओ पर भी जो अब अपने किस अज्ञातवास में हैं।  हमे नहीं पता। आपको पता चले तो उन्हें लवकेश के माता-पिता के दर्द के बारे में भी बताए और उनसे कहे कि इनके इन्साफ के लिए भी आवाज़ उठाए और उत्तरप्रदेश सरकार पर दबाव बनाए कि जिस अध्यापक की प्रताड़ना से तंग आकर उसने आत्महत्या की। उसके खिलाफ कार्यवाही हो।  

राहुल गांधी, अरविन्द केजरीवाल, मायावती, वृंदा करात ये सब अब कहाँ है ? जब जेएनयु में, देश विरोधी नारे लगे।  इन लोगो ने जरा भी समय नहीं गवाया और खड़े हो गए उन लोगो के पक्ष में, कहते है छात्रों की आवाज को दबाया जा रहा है। रोहित वेमुला ने आत्महत्या की तो ये सभी महानुभाव हैदराबाद पहुंच गए। अगर इनका पता आपको चले तो आप एक काम मेरा भी करना। इनसे पूछना, क्या लवकेश का दोष सिर्फ इतना था कि उसने ब्राह्मण जाति में जन्म लिया ?


शिक्षा की अर्थहीनता


हर साल हमे यह सुनने को मिलता है कि परीक्षा में असफल होने के कारण फलाना विद्यार्थी ने आत्महत्या करली।  ऐसे दर्जनों केस हमारे सामने हर वर्ष आते है और हर वर्ष हमारा एक ही जवाब होता है कि पढाई के दबाव में बच्चे सही गलत का निर्णय नहीं कर पाते और आत्महत्या कर लेते है।  क्या हमे यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारी शिक्षा प्रणाली क्या है ? और केसी है ? जो विद्यार्थी को जीवन में आने वाली कठिनाईयों का सामना करने की क्षमता देने के स्थान पर उनके अविकसित मष्तिक पर अतिरिक्त दबाव बना रही है | यह शिक्षा की अर्थहीनता नहीं है तो क्या है ?