Monday, 21 September 2015

देश के नेता चाहिए या पार्टी के नेता ??


 आजकल हम बिहार के चुनावी मौसम से घिरे हुए है। जिसका असर पुरे देश पर पड़ेगा। वही कुछ दलों के लिए ये शाख बचाने का मौका है तो कुछ के लिए अपनी लाज बचाने का मौका है। सभी पार्टिययो के अंदर एक अजीब डर है तो कुछ मीम (मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) जैसी पार्टिया अपनी राजनेतिक जमींन के लिए आ रही है।

 



पर एक बात तो पक्की है के भारत जैसे देश को अभी काफी समय लगेगा अपनी जातिवादी विचारधारा से बहार निकलने में। चाहे हम कितनी ही विकास की बात करले लेकिन चुनाव के मौसम में जातिवादी केचुए बाहर निकल ही आते है। हलाकि ये हम सब को पता है के केचुए कहाँ से आते हैं, लेकिन निश्चित रूप से उनका पता लगाना मुश्किल होता है। पर इन सब के बीच में एक अच्छी बात ये है कि आज सभी पार्टिया विकास को एक अहम चुनावी मुददा मान रही है, लेकिन आंतरिक रूप से वह अब भी जाति, धर्म के खेल में फंसी हुई है। तो कुछ को बोलने के लिए एक ही रटा – रटाया शब्द है जो हर चुनावी मौसम में इसका ढोल पिटते है। यह शब्द है “साम्प्रदायिकता” और यह शब्द अपने साथ अपने छोटे छोटे भाई – बहनों के साथ आता है जैसे “हिन्दू” , “मुस्लिम”, कट्टरवाद, देश को खतरा, “दुर्भाग्यपूर्ण”। कोई इन सबसे पूछे क्या है ये सब ? आप 5 साल , 10 साल , 15 साल सत्ता में रहते है और चुनाव के समय जनता को अपनी उप्लब्दिया बताने के स्थान पर, उनको जातिवाद धर्म और साम्प्रदायिकता में उलझा के रखना चाहते हो और कुछ नेताओ की तो बेशर्मी देखिये सजा हो चूकी है घोटाले में, और दुसरो को नसीहत देते फिरते है, और हमारे पत्रकार भाइयो की तो और भी मौज है जैसे बरसात के मौसम में मेढको के लिए हर जगह अनुकूल हो जाती है, कही भागना नहीं पड़ता, चारो तरफ उनके अनुकूलता होती है और 50 तरह की टर – टर और करने लग जाते है, पर उनसे यह नहीं पूछ सकते कि नेता साहब आप जो ये सिद्धांत  की राजनिति की बात करते है, आप तो खुद दोषी है भ्रस्टाचार के, जंगल राज के, चारा घोटाले के, आज जो आप भाषण दे रहे है, सिद्धांत की राजनिति का, सुशासन का | जब आप सत्ता में थे तब क्या किया, और तो और कोई उनसे पूछे जब जनता ने उन्हें पूरी तरह से नकार दिया है और अपनी राजनेतिक जमींन छोटी पड़ रही है तो सब लोग एक ही मंच पे आ गये अपनी राजनेतिक जमींन तलाश करने के लिए, जो कल तक एक दुसरे को कोसने में सभी मर्यादा तक भूल गए थे। एक कहावत को इन्होने चरितार्थ कर दिया कठिन समय में “मरता क्या ना करता” वैसे एक कहावत और थी लेकिन शब्दों की मर्यादा रखते हुए मै अपने आप को रोक गया  लेकिन वो शब्द थे “गधे को ............... पड़ता हैं”।    

Sunday, 20 September 2015

होसले बुलंद रख, आशाए रख उची , दुनिया जिसे असम्भव कहे, तू रट लगा उसी की



होसले बुलंद रख, आशाए रख उची,
 दुनिया जिसे असम्भव कहे, तू रट लगा उसी की,

छोड़ दे सोचना, वक्त पर ये तू,
वो भी एक बार कह दे होसला तुझी को ----२

तू ना हारा हार से ये गांठ बाँध ले तू ,
विजय भी छुले चरण , एक बार जो ठान ले तू

दुनिया के फेर में फिरे सब,
 दुनिया को फेर ले ये होसला रख,

कह दे सब से --२ नादान नहीं है तू 
मंजिले है चारो और ये बात  है तुझ में

ले एक दिशा और बढ़ चल तू,
भूल जा कल क्या होगा, 
वही  होगा जो एक बार सोच ले तू
.......
Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।
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मेरी राह



मेरी राह निकल गई मंजिलो से आगे, 
जहां सब ठहरे  मेरा बसेरा न था ,

युही चलता गया मै भी किस सोच में,
 सब छूट गए मेरे इस दौर में,


मुश्किलो से मेरा सामना हुआ है अभी, 
मै जब लड़ा वो वक्त कुछ और था ,


सोच और शहर बदलने है मैंने,
 सूरत बदलती देख रहा हूं,


बद्लुगा इस बदलती तस्वीर को एक दिन ,
इसलिए खुद को बदलते देख रहा हूं ||



Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।