Sunday, 28 May 2017

आंदोलन का ट्रेंड़


मुझे आज कल एक चीज बहुत महसूस हो रही है शायद आपको भी हो रही होगी शायद नहीं भी कि अन्ना आंदोलन के बाद हमारे देश मे आंदोलन करने का एक ट्रेंड निकल पड़ा। हर दो चार महिने बाद कोई भी कही भी खड़े होकर तीन-चार अपनी पसंद के नारे लगाता है, विरोध करता है। 4-5 गंभीर समस्याओं की सूची अपने मुखार बिन्द से गिनाता है। अपनी कौम, अपनी जाति, अपने धर्म की बात करता है। देश का सच्चा नागरिक होने की और सविधान की कसमें खाता है। संविधान सभा के चेयरमैन रहे ड़ा भीमराव अंबेड़कर का नाम लेता है। गरीबो, मजबूरों, शोषितों, दलितों के हित के लिए लड़-मरने की बात करता है। कुछ दिन बाद उसके सोशल मीडिया पर कैंपेन चलते है लोगों को उसके बारे में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बताया जाता है कि यह वही शख्स है जो आपके अधिकारों के लिए लड़ रहा। कल तक उसके मौहल्ले के आखिरी मकान में रहने वाला आदमी, उस कथित नेता का नाम तलक नहीं जानता था। लेकिन कुछ दिनों में ही वह सोशल मीडियां में ट्रेंड करने लगता है। जब वह माल (खबर) बाजार में बिकने लायक बन जाता है। उसके बाद वह मुख्य मीडिया पर आना शुरू हो जाता है। अब उसे उसके मौहल्ले वाले ही नहीं बल्कि उसे वो लोग भी जानने लगते है जो उसके मौहल्ले के नहीं है। फिर उसके टीवी पर आने जाने का सिलसिला शुरू होता है। उसके कौम वाले, उसकी जात वाले, उसके धर्म वाले उसे ऐसे देखते है जैसे वह बहुत बड़ा समाजसेवी हो।

जबकि वह फल है उस नकारात्मक राजनीति का और विकृत चेहरा है हमारी समाचार पत्रों की मानसिकता का। जो बड़े चाव से इस तरह के कच्चा माल समाज से उठाते है और उसमें अपनी पसंद का फेर बदल करके फिर दुबारा उसे उसी बाजार में बेचते हैं। क्योंकि न्यूज, खंबर  यह समाचार पत्रों, चैनलों के लिए बस एक उत्पाद है। जिसे मिर्च-मसाला लगाकर अपनी पसंद के बाजार, और निर्धारित दर्शको को बेचा जाता है तभी तो उनकी दुकान चलेगी। यह लोग तर्क-वितर्क नहीं करते बल्कि अघोषित मुद्दे को घोषित मुद्दा बनाकर पेश करते है।  यह इन तथा कथित नेताओं से तीखे सवाल पुछने कि हिम्मत नहीं करते। वह उन्हें आइना भी नहीं दिखाते ताकि कल को उनका कच्चा माल (खबर) खराब न हो जाए। बल्कि उनका नामकरण कर देते नेता के रूप में।

अन्ना आंदोलन के बाद निकली नई पार्टी, फिर पाटीदार आंदोलन और अब यह भीम आर्मी वही कच्चा माल है जिसे न्यूज वाले बाद में पका पका कर खाएंगे। इससे दोनों के हित सध रहे है। एक शॉर्ट कट तरीके से नेता बन जाता और दूसरे को समाज में बेचने के लिए नया उत्पाद मिल जाता है।  

Saturday, 27 May 2017

कूड़े में भविष्य तलाशता बचपन...



बचपन और खेल एक दूसरे के पूरक माने जाते है। बच्चें जहां हो, जैसे हो वह खेल व खेलने का समय ढूंढ ही लेते है। चाहे वह पढ़ाई करते हो या घर की मजबूरी के चलते मजदूरी, वह खेलना नहीं भूलते। लेकिन कुछ बच्चों का बचपना बाल मजदूरी की भेंट चढ़ जाता हैं।

मां-बाप का दुलारा जिसे अभी ढंग से बोलना नहीं आता जो अभी दुनिया की दौड़ को जानता नहीं है। जिसके पैर चलते हुए भी लडखडाते है जो दुनिया की चाल से अभी वाकिफ नहीं हैं, जिसे मां का आंचल ही अपनी सारी दुनिया लगता है। जो पेट में होती कसन को सही परिभाषित नहीं कर सकता कि यह भूख है या कुछ और। घर से बाहर काम के लिए निकलता है। जिसका बचपन इतना मासूम है कि वह यह भी नहीं जानता कि जो काम वह रोजाना करता वह केवल उसकी ही नहीं बल्कि उसके मां-बाप की भी मजबूरी का परिणाम है।


काम पर अनायास ही जब कभी उसका मन खेलने के लिए मचलता, एक भारी आवाज उसे टोक देती। वह मन मसोस कर बैठ जाता लेकिन कुछ देर बाद फिर यही क्रम होता है। धीरे-धीरे उसकी कल्पना, उसकी इच्छा दम तोड़ रही होती है। जिसको वो जानते हुए भी पहचान नहीं पाता। वह यह जानता ही नहीं है कि उसका भविष्य दो जून की रोटी के लिए कुर्बान हो रहा है। बचपना कब खत्म हो गया उसे पता ही नहीं चला। वह पीछे मुडकर देखता है तो उसे नजर आता है कुड़े में भविष्य तलाशता अपना बचपन... 

Wednesday, 24 May 2017

शब्बीरपुर हिंसा के पीछे का सच

महाराणा प्रताप की जयंती मनाने के लिए 5 मई को शब्बीरपुर के 20-25 युवक तेज आवाज में गाना बजाते हुए, पास के ही शिमलाना गांव जा रहे थे। शब्बीरपुर गांव के प्रधान ने तेज आवाज पर आपत्ति जताई व अपने साथियों समेत उसे रोकने की कोशिश की साथ ही पुलिस को इस बाबत सूचना दे दी। प्रधान का कहना था कि कार्यक्रम के लिए प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई थी। गांव का प्रधान अनुसूचित जाति का है। एसएसपी सुभाष चन्द्र दुबे के मुताबिक पुलिस ने मौके पर पहुंच कर डिजे बंद करवाया व उन्हें शिमलाना गांव के लिए रवाना करने लगे।  इसी दौरान कार्यक्रम में जाते लोगों (राजपूतों) पर छतों के ऊपर से दलित समुदाय के लोगों ने पथराव शुरू कर दिया । जिसमें राजपूत समुदाय के 16 लोग घायल हो गये व सुमित सिंह नाम के 27 वर्षिय राजपूत युवक की मौत हो गई। इसकी सूचना जब शिमलाना कार्यक्रम में मौजूद राजपूतों को पता चली तो वह बड़ी संख्या में आए और उन्होंने दलित समुदाय 15-20 घेरों ( वह स्थान जहां पर भुस व पिटौड़ा आदि रखे जाते हैं) में पथराव और आगजनी की। तभी से दोनों समुदाय के बीज तनाव की स्थिति बनी हुई है।

 

डीएम नागेंद्र व एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे ने बताया कि 9 मई को भीम आर्मी नाम के दलित संगठन ने सहारनपुर के गांधी पार्क में बिना अनुमति के 5 मई की घटना के खिलाफ महापंचायत का आयोजन रखा। जब पुलिस बिना अनुमति के हो रहे आयोजन को रोकने पहुंची तो वे लोग उग्र हो गए। उन्होंने वाहनो और पुलिस पर पथराव शुरु कर दिया, जिसमें ड़ेढ़ दर्जन बाइक, दो बसे, तीन कारें जलकर खाक हो गई। बस में मौजूद 46 यात्रियों ने किसी तरह अपनी जान बचाई। यात्रियों के मुताबिक 8-10 नकाबपोश लोगों ने इस घटना को अंजाम दिया। एसपी सिटी और पत्रकारों पर भी हमला किया गया।

21 मई को हालात का जायजा लेने बसपा सुप्रीमो मायावती भी सहारनपुर के शब्बीरपुर व और चन्द्रपुरा पहुंची लेकिन उनके पहुंचने से पहले ही चंद्रपुरा के दलितों ने राजपूतों के घर पर पथराव व आगजनी की। उसके बाद राजपूतों ने भी अपनी तलवारें निकाल ली। हालात एक बार फिर तनाव पूर्ण बन गए।

 

5 मई के बाद से एक के बाद एक हुई घटनाक्रम पर नजर डाली जाए तो यह एक बढ़ी राजनीतिक साजिश लगती है। भीम आर्मी की भूमिका  भी संदिग्थ है। भीम आर्मी के मुखिया चन्द्रशेखर आजाद ने एक ऑडियो रिलीज किया जिसमें अपने सभी दलित भाईयों को 21 मई को जंतर-मंतर पर इकठ्ठा होने का आह्वान किया। इस ऑडियो क्लिप में वह अपने आपको ‘एडवोकेट चन्द्रशेखर आजाद रावण’ कहता है। इसके बाद ‘नीला सलाम’ कहकर ऑडियो खत्म करता है। नीला सलाम ‘लाल सलाम’ से बहुत मेल खाता है। अपने नाम के साथ ‘रावण’ जोड़ना और हक की लडाई की बात करते हुए नक्सल आंदोलन को सही ठहराने की कोशिश करना और वामपंथियों संगठनों की तरफ से भीम आर्मी को मिल रहे समर्थन से लगता है कि यह समाज को बांटने साजिश की जा रही है।

 

आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता डे ने आईएएनएस से कहा, “हमारी मांग है कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद पर लगाए गए आरोप वापस लिए जाएं और दलित ग्रामीणों को निशाना बनाने वाले और उनके घरों को जलाने वाले तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।” जिस प्रकार इसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी) की छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन के सदस्य विरोध-प्रदर्शन में सक्रिय हैं व आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष के बयान आ रहे हैं उससे दो समुदाय के बीच की खाई और बढ़ रही है।  

 

अब आप सोच रहे होगे कि अभी कोई चुनाव भी नहीं है तो इस में राजनीतिक साजिश का क्या औचित्य है?  यही समझने वाली बात है- उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा अपनी जमीन खोते जा रहे है। बड़ी संख्या में मुस्लिम और दलित बीजेपी का रुख कर रहे हैं और अब वामपंथी विचारधारा से भी अधिकतर युवाओं का मोह भंग हो रहा है और भाजपा को यूपी व देश के अन्य भागों में स्वीकारा जा रहा हैं। वह विपक्ष के लिए खतरें की घंटी हैं। इसी से पार पाने के लिए यह एक सोची समझी साजिश नजर आ रही है। अपने गिरते वोट बैंक और भाजपा के बढ़ते कद से निजात पाने के लिए, अपने वोट बैंक को एकजुट करना आवश्यक था। 2019 में भाजपा के विजयरथ को रोकने के लिए और हिंदु समाज के एक वर्ग को सर्वण समाज का ड़र दिखाकर काटना जरूरी था। दलित अस्मिता और अम्बेड़कर के नाम पर भीम आर्मी का मुखिया जिस प्रकार केंद्र में मोदी और प्रदेश में योगी पर सवाल खड़े कर रहा है। उसके अपने बयानों में मुस्लिम व दलितों की बात करना इस बात की पुष्टि करता है कि यह कोई दलित आंदोलन नहीं बल्कि साजिश है। जिसका आज नहीं तो कल सच सामने आ जाएगा। 

 

Tuesday, 23 May 2017

दोस्ती महज अफवाह है साहब


जो चाहा तुम में मिला नहीं
वरना,मिलने में कसर कोई बची नहीं,
जब छोड़ चुके थे साथ तेरा हम
ऐसी कोई कमी नहीं जो तुम्हें हम में मिली नहीं,

ऐसा भी नहीं की हमने बहुत चाहा तुमसे
                     बस हमारी तबियत तुमसे मिली नहीं,

दोस्तों के आगें तुम मुझे बदनाम करते हो
हमने दिन-को-दिन कहा,ये बात हमारी तुम्हें जमीं नहीं,

मैं सपनों में जिया नहीं करता
हकीकत में तुम मेरी, थी ही नहीं,

मैं आज के इश्क को इश्क नहीं मानता
दो बर्गर ना खिला पाए, वो मेरा साजन नहीं,

अब तो रिश्तों में लेन-देन की बात होती है
अब लोग कहां वो, जो दे दिया सो दे दिया 
पीछे परवाह की नहीं,

दोस्ती महज अफवाह है साहब
बस सीढ़ी का, कोई दुसरा शब्द मिला नहीं,

भले ही लाख सच्चे हो तुम
झूठ की दुनिया में तुम्हारी कोई कीमत नहीं,

मैं अकेले चले जा रहा हूं
मुझे भी किसी और की जरूरत नहीं,

यकीं है मुझे मेरे खुदा पर
औरों की अब मुझे भी फिकर नहीं।।




Monday, 22 May 2017

अभी स्वच्छ दिल्ली दूर है...


भारत सरकार भले ही स्वच्छ भारत अभियान को जन आंदोलन बनाने के लिए प्रयासरत है लेकिन कहीं न कहीं अब यह आंदोलन दम तोड़ता नजर आ रहा है। केवल जन भागीदारी से इस अभियान को सफल नहीं बनाया जा सकता। इसमें सरकार की भूमिका की भी उचित भागीदारी आवश्यक है। हाल ही में, देश के 434 शहरों का सर्वे हुआ, जिन्हें साफ-सफाई के विभिन्न मानकों पर परखा गया। इसमें देश की राजधानी ही साफ-सफाई की सूची में पहले 50 में अपना स्थान नहीं बना पाई तो देश के बाकी आम शहरों से क्या उम्मीद की जा सकती है?

फिर भी इस सूची में मध्य प्रदेश का इंदौर शहर पहले स्थान पर जगह बनाने में सफल रहा जबकि मध्य प्रदेश का भोपाल व आंध्र प्रदेश का विशाखापटनम क्रमश: दूसरे व तीसरे स्थान पर रहे। उत्तर प्रदेश का गोंडा फिसड्डी साबित हुआ। गुजरात के 12 व मध्य प्रदेश के 11 शहर टॉप 50 शहरों की सूची में शामिल है। उत्तर प्रदेश का वराणसी को अगर छोड़ दे तो कोई भी शहर टॉप 50 में स्थान नहीं बना पाए और हरियाणा का तो एक भी शहर नहीं है। अगर आंकड़ो को ध्यान से देखे तो जो शहर सूची में टॉप रहे, वहां की जनता के साथ-साथ सरकार भी धन्यवाद की पात्र हैं।

देखनी वाली बात यह भी है कि जनता हो या सरकार इनकी प्राथमिकताओं में साफ-सफाई कभी नहीं होती। इस मानसिकता को बदलने की जरूरत हैं। केवल मानसिकता ही नहीं बल्कि गांव शहरों की सफाई के लिए आधुनिक तकनीक के साथ-साथ वर्कफोर्स को भी बढ़ाना होगा। तभी हम 2019 में गांधी जी को उनकी 150 वीं जयंती पर स्वच्छ भारत व स्वस्थ भारत का तौफा दे सकेंगे।

जब तक सांस है मेरी, तब तक


मैं दर्द में खामोश हूं,
मेरा चिल्लाना तुमने सुना होगा,
तुम कहां हो, या अनजान बन गए हो तुम,
मैं शब्द में नहीं हूं, ना कभी रहा हूँ मैं,
मुझे भावनाओं में सुन सकती हो तुम,
                     शायद सुना भी हो                                                                                                                                                                                  
जैसे तुम मेरे अंतर मन में हो कही,
पर मेरी दुनिया में मर चुकी हो,
मैं अकेला होता हूं कभी-कभी,
जब अपने पास होता हूं ,

मुझे आज भी एहसास है,
उस आखिरी मुलाकात का,
क्या तुम्हें है,
हां हां तुम्हे तो होगा ही,
तुम तो सिसक जाती थी,
ये अनकही सच्चाई सुनकर..
वो सवाल तुम्हारे, जिनका उत्तर जानकर भी मैं,
खामोश रहता था,

मेरी चुप्पी में एक तुफान था,
शायद जिसे तुम देख न पाई,
बार-बार उठते वो चक्रवात,
तुम्हारे उस एक सवाल पर,
क्या हम अलग हो जाएगे?

मैं उस आंधियों को अपने में ही दबा लेता था,
तुम तक आती थी बस ठंड़ी हवा,
जो तुम्हें शांत कर देती थी,  पर कुछ पल के लिए,
 तुम्हे याद है वो सब, या वक्त के साथ वो भी पीछे छुट गया,
मुझ में कैद है वो अभी, शायद हमेशा, नहीं-नही, शायद नहीं हमेशा,
   जब तक सांस है मेरी, तब तक।।
                            
Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत (प्रिंट) किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Wednesday, 10 May 2017

एक कैफे ऐसा भी...



दिल्ली: आपने हर तरह के कैफे व रेस्टोरेंट के बारे मे सुना होगा जो अपने ग्राहकों को लुभाने के लिए नए-नए ऑफर देते हैं। क्या कभी ऐसे कैफे के बारे में सुना है जो न केवल आपको स्वादिष्ट व्यंजन परोसता है, बल्कि वह आपको साइन लैंग्वेज भी सिखाता हो?

जी हां, ऐसा ही कैफे है साउथ दिल्ली के मोतीबाग में, जिसका नाम- “ईकोज कैफे” है। इसकी की खास बात है कि यहां काम करने वाला सारा स्टाफ मूक-बधिर हैं, जिनकी कुल संख्या 16 है। ग्राहक वेटर को बुलाने के लिए टेबल के पास ही मौजूद स्विच दबाते हैं, जिससे वेटर-रुम में लगा उसी टेबल नंबर वाला बल्ब जल उठता है और वेटर टेबल के पास जाकर ऑर्डर लेता है। यहां पर उपलब्ध मेन्यू कार्ड भी बिल्कुल अलग तरह का है। जिसे इस्तेमाल कर कस्टमर अपनी पसंदीदा चीजों का आर्डर दे सकते हैं। चम्मच, फोक इत्यादि वस्तु मंगाने के लिए प्ले कार्ड का इस्तेमाल किया जाता हैं।
यहां आने वाले ग्राहक खुश हैं। कैफे में आयी विनीता कहती है कि "उन्हें यहां आकर लगता ही नहीं कि ये लोग बोल और सुन नहीं सकते बल्कि यह चीजों को अलग तरह से प्रस्तुत करते हैं जो काफी आकर्षक होता हैं। मूक-बधिर लोगो को अपने पैरों पर खड़ा देख बेहद खुशी मिलती है"। उन्होंने बताया कि वह इस कैफे में आती है और अपने दोस्तों को भी यहाँ आने की राय देती हैं।  
कैफे के मालिक गौरव ने बताया कि "इसकी शुरूआत हम 6 दोस्तों ने मिलकर दिसंबर 2015 को की थी। कुछ अलग करने की चाह ने हमें यह आइडिया दिया। शुरूआती दिनों में हमें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा क्योंकि हमें खुद साइन लेंग्वेज नहीं आती थी इसलिए हमने पहले इसे सीखा और यहां के स्टाफ को भी सिखाया। अब सब आसान और सामान्य हो गया है। लोगों को यह कैफे बहुत भा रहा हैं। लोग बहुत संवेदनशील हैं। मूक- बधिर स्टाफ आकर्षण का केंद्र है।" उन्होंने बताया कि "हमने इसकी एक शाखा बेंगलुरु में भी खोली है, जिसने ग्राहकों के बीच जल्दी अपनी जगह बना ली है।"