Sunday, 18 December 2016

क्या चाहता हूं मैं आसमां या ज़मी


क्या चाहता हूं मैं, आसमां या ज़मी,
क्यों मुस्कुराता हूं मैं, क्यों हैं ये हंसी।

जंमी पर आसमां के सपने है मेरे,
जब थकता हूं याद आती हैं ये जंमी।

उलझनों में उलझा रहता हूं,
मंजिल की तलाश में,कभी हार हैं कभी जीत
मैं उदास क्यों हूं, मैं इसकी तलाश में हूं

किस फेर में पड़ा हूं,
क्यों ये आसमां क्यों ये जमीं।

ख्याल रहता है, रब तेरा भी,
क्यों पाऊ आसमां क्यों ये ज़मीं।

क्या साबित करना है मुझको,
क्यों न बनू खुद आसमां ये ज़मीं।। 


Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Tuesday, 13 December 2016

न खुद को अकेला समझ, न ढूंढ ठिकाना रोने का




न खुद को अकेला समझ, न ढूंढ ठिकाना रोने का,
ये वक्त मिला है तुझ को, कुछ बनने का कुछ होने का,

ठुकरा दे आशाएं सबकी, कुछ कहने की कुछ समझाने की,
ये आग दिल में जगाए ऱख, कुछ बनने की कुछ होने की,

रख हौसला खुद पर, न घबरा विपत्तियों के वार से
जीती उन्होनें दुनिया जो नहीं डरते हार से,

बदले लकीरें हाथो की, जो चलें तेरे विरूद्ध,
तोड़ दे निराशाओ की बंदिशे, कामयाबी मिलेगी खुद व खुद

न खुद को अकेला समझ, न ढूंढ ठिकाना रोने का,
ये वक्त मिला है तुझ को, कुछ बनने का कुछ होने का,

तु न रुक, तु न ड़गमगा, रख होसला खुद पर,
हवा से तेज हो जा,

उखाड़ दे बाधाओ के हर पेड़ को, जो रूकावट बनें तेरे मार्ग की,
ये आग दिल में जलाए रख कुछ बनने की कुछ होने की,

तु न खुद को अकेला समझ, न ढूंढ ठिकाना रोने का,
ये वक्त मिला है तुझ को, कुछ बनने का कुछ होने का।।

Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Monday, 12 December 2016

समझदार कौन ?



आज हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। 21वी सदी बोलते हुए हम गर्व से सीना चौड़ा कर लेते हैं। तर्कों और कुतर्कों के बीना हम किसी भी बात को मानने के लिए तैयार नहीं होते। हम आज अपने आपको बुद्धिमान कहते हैं। विज्ञान को सभी चीजों का आधार मानकर, हर छोटी बड़ी चीज को विज्ञान के तुला में तौलते हैं और जब कुछ प्रश्नों का जवाब विज्ञान नही दे पाता तो कहते हैं, यह तो प्रकृति का चमत्कार है।
चमत्कार और विज्ञान एक-दूसरे से ऐसे जुड़े हैं जैसे उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव। विज्ञान चमत्कार को नहीं मानता लेकिन चमत्कार विज्ञान को मानता है। वो उस असीम शक्ति से जुड़ा है जो प्रकृति के सभी नियमों से ऊपर है।

क्या विज्ञान ऐसी किसी घटना को चमत्कार कहेगा जिसमें बुद्धिमान मनुष्यों से पहले जानवरों को प्राकृतिक आपदाओं का अनुभव हो जाता है। दक्षिणी तटों पर जब सुनामी आई तो उसके पहले वहां मौजूद पशु-पक्षिय़ों ने असमान्य व्यवहार करना शुरु कर दिया लेकिन ये असमान्य व्यवहार, हमारी नजरों में था, उनकी नजरो मे नहीं.. क्योंकि उन्हें पूर्वानुमान हो चुका था कि कुछ अनहोनी होने वाली है और वह किससे और किस ओर होने वाली है। वहां मौजूद हाथी अपने सवारों सहित ऊचें स्थानों की ओर दौड़ पड़े।  जिससे वे खुद को उस सुनामी से बचा पांए।

अपने आपको बौद्धिक कहने वाला इंसान उन जानवरों के व्यवहारिक ज्ञान और छिपी हुई शक्तिओं से हार गया। ( क्या हम सही मायनों मे बुद्धिमान हैं )
मैं डिस्कवरी चैनल पर एक रिपोर्ट देख रहा था। उसमें एक विशेष प्रजाति का तोता फल खाकर एक विशेष प्रकार की मिट्टी को खाते हैं। जब उनके इस व्यवहार का अध्ययन किया गया तो पता चला कि वे जो फल खाते हैं, वो जहरिले होते हैं। उसके प्रभाव को खत्म करने के लिए ये तोते उस विशेष प्रकार की मिट्टी का सेवन करते हैं। समझने वाली बात है कि उन्हें इस का ज्ञान कैसे हुआ, पहले तो यही कि वे फल जहरिले हैं दुसरा उसका उन पर दुष्प्रभाव पड़ेगा और यह केवल तोतों तक सीमित नही हैं। अन्य पशु-पक्षी भी कुछ इसी प्रकार का व्यवहार करते हैं, विशेष परिस्थितियों में।


लेकिन आज का आधुनिक मानव क्यों इस काबिल नहीं हैं कि वह इन सब विधाओ को जान सके और अपने मन को नियंत्रित कर सही फैसले ले सके। आज हम आधुनिक मानव का तमगा अपने गले में लटकाए घुम रहे हैं। लेकिन प्रकृति और सम्पूर्ण मानव समाज को अगर किसी से खतरा है तो इसी आधुनिक मानव से। यह सब कुछ जानता है लेकिन अपने स्वार्थ सिद्धी के लिए न केवल प्रकृति को बल्कि अपने वर्तमान के साथ-साथ भविष्य को भी विनाश की ओर ले जा रहा है। अपनी सीमित बुद्धि और क्षमताओं से पशु-पक्षी एक श्रेष्ठ प्रकृति प्रेमी का आचरण करते हैं किंतु आधुनिक मानव नहीं...

Saturday, 3 December 2016

राष्ट्रगान को लेकर गैर जरुरी बहस



हालही में सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा घर में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य कर दिया, जो इसे नहीं मानेगा उसके लिए सजा का प्रावाधान भी किया गया हैं। खैर मैं उसकी तकनीकी बारिकीयों में नहीं जाना चाहता। मुद्दा यह हैं कि राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवी वर्ग में, अब इसके पक्ष-विपक्ष की बात को लेकर भी बहस तेज हो गई हैं, जो गैर जरुरी है।

हर बात को व्यकितगत आजादी, व्यकितगत स्वतंत्रता से जोड़ना सही नहीं हैं। अगर इस देश का नागरिक ही, देश का सम्मान नहीं करता तो उसे वो भी इस देश द्वारा दिये गए नागरिक अधिकारों के लायक नहीं है। यह हमे समझना पडेगा।

पत्थर, छिनी और हथौड़े की मार झेल कर ही, मुर्ति का आकार ग्रहण करता हैं। इसलिए कानूनी बाध्यता भी जरुरी हैं। भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान वंदना कटारिया, जब फिल्म देखने हरिद्वार स्थित मॉल में गई, तो वहां पर राष्ट्रगान नहीं बजाया गया। जब इस बारे में मॉल अधिकारियों से बात की, तो उन्होंने कहा कि उन्हे अभी इसकी अधिसूचना नहीं मिली। इसके बाद वह फिल्म देखे बिना ही चली गई।


यह तर्क अपने आप में ही हास्यपद हैं। अपने देश के सम्मान करने के लिए भी अब हमें अधिसूचना की जरूरत पड़ेगी। यह घटना अपने आप में ही हमें चेताती हैं कि हम किस देश, राष्ट्र या समाज का निर्माण कर रहे हैं। क्या अपने देश और माता-पिता के सम्मान करने के लिए हमे सर्कुलर चाहिए। 

Wednesday, 23 November 2016

सीमा पर मरता सैनिक, एक परिवार उजड़ गया



सीमा पर मरता सैनिक, एक परिवार उजड़ गया,  
तुम कहते रहे, कडा जवाब, अब तक तुमने क्या किया,

कहां गई वो बाते, जो अब से पहले होती थी,  
जब चलती थी गोली सीमा पर,  तीखी बोली होती थी,

किसका डर और क्या है ड़र, ये आज हमें तुम बतलाओ,
इकोनॉमी के चक्कर में, तुम स्वाभिमान ना बेच आओ, 

खुली जंग का ऑर्डर दो, तोल-मोल की छोडो बात,
पाकिस्तान चीज ही क्या, उसको बताओ उसकी औकात,

माना की फासले, अभी तय करने रहते है,
तुम एक आवाज लगाओ, हम सबकुछ त्यागे बैठे है,

पर शर्त यही, कि अब की बार कोई कसर न छोड़ी जाए,
हम रहे या न रहे, पर दुश्मन जिंदा न जाए,

याद करो तुम प्रताप को, जो लड़ा अपने स्वाभिमान पे,
लडता-डटता खड़ा रहा, अमर हुआ अपनी आन पे,

हम तो फिर भी बहुत बड़े, वो क्या हमको मारेगा,
एक बार जो चिल्ला दे हम, ऑखो से आंसू झाडे़गा,

शांति के कबुतर बंद करो, उठा ले आओ तुम भी एक बाज
हम देख ही ले या तो वो हैं, या हम हैं आज ।।

Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Saturday, 5 November 2016

क्यों बैन हुआ एनडी टीवी ?



हिंदी के प्रमुख समाचार चैनल एनडी टीवी पर 9 नवम्बर की रात 12.01 बजे से 10 नवम्बर की रात 12.01 बजे तक प्रसारण पर रोक लगा दी हैं । इस दौरान एनडी टीवी देश भर में ऑफ एयर रहेगा। 

इसका फैसला संसदीय समिति ने लिया। जिसमें एनडी टीवी को 'टीवी केवल नेटवर्क नियम 1994' के उल्लघन का दोषी पाया गया। इस कानून के तहत कोई भी न्युज चैनल आतंकरोधी कार्रवाही का सीधा प्रसारण नहीं कर सकता। एक अखबार के मुताबिक समिति ने चैनल का प्रसारण 30 दिन के लिए रोकने का प्रताव दिया था। लेकिन मंत्रालय ने सांकेतिक रूप से सिर्फ एक दिन के लिए किया।

एनडी टीवी ने पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की लाइव रिर्पोटिंग के दौरान एयरबेस के संवेदनशील स्थान आतंकियों से कितनी दूरी पर हैं, जानकारी दी। स्कूल, रिहायसी कॉलोनी, फ्यूल टैंक कहां पर हैं ?, मिग विमान कितनी दूर हैं ? जैसी संवैदनशील जानकारी आप प्रसारित कर रहे हैं जबकि आपको पता हैं अन्दर आंतकराधी ऑपरेशन चल रहा हैं। इसका इस्तेमाल आतंकी कर सकते हैं। आपने टीआरपी के लिए न केवल अन्दर स्तिथ रिहायशी कॉलोनी के लोगो का और स्कूल में पढने वाले बच्चों का जीवन खतरे में डाला बल्कि एयरबेस में कौनसी चीज कहां पर हैं, इसकी सूचना भी प्रसारित की।

ऐसा नहीं  एनडी टीवी ने ऐसा पहली बार किया हैं। 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई हमले के दौरान भी ऐसा ही किया गया था। जिसमें लाइव रिपोर्टिंग के दौरान, कितने हेलिकॉप्टर दिल्ली से आए हैं। उसमें कितने कमांड़ो हैं। वह आतंकियों को रोकने के लिए, क्या-क्या कदम उठा रहे हैं। इसकी मिनट-दर-मिनट रिपोर्टिगं की।

इसलिए जो लोग आज गला फाड-फाड कर लोकतंत्र खतरे में है, का रोना रो रहे हैं। उन्हें तब याद नहीं आया कि इस तरह की रिपोर्टिग से न केवल सुरक्षा बलो का बल्कि वहां मौजूद अन्य लोगो का जीवन भी खतरे में पढ जाता हैं 

यह देश की कोई पहली घटना नहीं हैं। जिसमें किसी चैनल को बैन किया हैं। 2005 से 2013 तक 20 चैनलों को ऑफ एयर किया गया। इसमें ज्यादातर को अश्लील सामग्री दिखाने  के लिए प्रतिबंधित किया।
2007 से 2010 के दौरान फैशन टीवी के प्रसारण पर 3 बार प्रतिबन्ध लगाया। अश्लील सामग्री दिखाने पर  प्रथम बार इस चैनल पर 2  माह के लिए प्रसारण पर रोक लगी। 2015 में अल जजीरा को भी 5 दिन के लिए बैन कर दिया क्योंकि उसने भारत का गलत नक्शा दिखाय़ा था।

इसलिए जो लोग लोकतंत्र का हवाला दे रहे हैं। उन्हे यह समझना होगा कि जब लोग सुरक्षित होगें तो लोकतंत्र भी सुरक्षित होगा। लोकतंत्र या बोलने की आजादी की आड़ में लोगों की और राष्ट्र की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं करने दिया जा सकता। 

कुछ को यह भी समझना होगा, एनडी टीवी का मतलब लोकतंत्र और लोकतंत्र का मतलब एनडी टीवी नही हैं। समाचार चैनलों को आलोचना करना ही नहीं झेलना भी आना चाहिए। 
#ndtv banned 

Thursday, 3 November 2016

मुझे हिंदी बोलने में होता है गर्व का अनुभव






मैं एक भारतीय हूं और हिंदी बोलने में मुझे गर्व होता हैं। किसी अंग्रेज को हिंदी बोलते सुनता हूं तो दिल को बहुत सुकून महसूस होता है। मुझे अंग्रेजी की भी समझ है। इसके बावजूद मुझसे अंग्रेजी में व्याकरण की भी हो जाती हैं क्योंकि 95 प्रतिशत मैं अपनी मातृ भाषा में ही बात करता हूं, उसी को पढता हूं। हिंदी का पत्रकार होने के चलते यह मेरे पेशे का हिस्सा भी है। इसलिए अंग्रेजी में गलती होने पर मुझे कोई शर्म भी नही आती, हालांकि मैं सुधार का पक्षधर हूं। हां, मुझे शर्म तब आती हैं, जब मैं हिंदी के किसी शब्द का अर्थ नहीं जानता या किसी भारतीय को यह कहते सुनता हूं कि मुझे हिन्दी थोड़ी कम आती हैं और यह कहते हुए वह गर्व से सीना चौडा कर लेता हैं।

हिन्दी हमारी 
मातृ भाषा हैं। इसे बोलने में पढने में गर्व का अनुभव होना चाहिए। मां कैसी भी हो बच्चे के लिए सबसे अच्छी और खुबसूरत होती हैं। इसलिए हमें गर्व से सिर उठा कर कहना चाहिेए कि हम हिन्दी बोल सकते हैं और हमें इसका गर्व हैं। क्योंकि व्याकरण की दृष्टि से भी और शब्द भंडार के मामले में भी यह अंग्रेजी से कोसो आगे हैं। सम्मान सभी भाषा का करो लेकिन अभिमान अपनी मातृ भाषा का ही होना चाहिए।                                       
जय हिन्द जय भारत

Tuesday, 11 October 2016

गुजरे जमाने की बात


ऊंची-ऊंची इमारतें सडको पर सरपट दौडती गाड़ियां, शाम को रोशनी से नहाए बाजार, लोगो का एक-दूसरे के नजदीक से गुजरना, एक भीड़ को पार करते हुए, दूसरी भीड़ का हिस्सा बनना, अपनी मंजिल पर पहुंचना। मेट्रो शहरो में यह आम बात है। इस चकाचौंद भरे जीवन को पाने के लिए हम दिन भर कोल्हू के बैल की तरह घूम रहे हैं परन्तु पहुंचते कही नहीं। इस दौड़ में जीतने वाला भी हारता है और जो हारता है, वह फिर एक नई दौड़ में शामिल हो जाता हैं।

सुख-सूविधओ की इस दुनिया में, शान्ति कही नही मिलती है। फिर भी हम सब इस दौड़ का हिस्सा बनना चाहते हैं। जब तक हमें समझ आता हैं कि सारा जीवन इसी भाग-दौड़ में निकल गया। तब जीने के लिए समय ही नही बचता।
चौपालो में बैठना, मिले कोई तो राम-राम कहना , चलते-चलते बुजुर्गो का छोटो को डांटना, यह सब अब गुजरे जमाने की बात हो गई हैं। क्योंकि आज हम सभी मेट्रों में रहना चाहते हैं, मनों में नही। अंत में, मैं बस इतना कहना चाहूंगा-

इस वाट्सएप के संदेशों में पत्रों वाला प्यार कहां,
वो नमस्कार, वो चरण स्पर्शं, वो अपनेपन की बात कहां।।


Monday, 26 September 2016

भगवान को दी सफाई की जिम्मेदारी


दुनिया में राजा हो या रंक, सभी भगवान की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। अगर उन्हे ही सफाई की जिम्मेदारी दे दि जाए। सुनने में कुछ अटपटा सा लगता है लेकिन  यह सत्य हैं। इसका प्रमाण आपको ‘नोएडा 15’ मेट्रो स्टेशन  के पास बने मैट्रो के पिलर पर मिल जाएगा।   
  
मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने घोषणा की कि 2019 में, गाँधी जी की 150वी जयंती पर उन्हें स्वच्छ भारत तौफे के तौर पर देंगे। लेकिन यह अभियान एक फोटो के अवसर तक ही सीमित रह गया।

हम इस बात से तो वाकिफ हैं ही कि जो काम दुनिया में कोई नही कर सकता, उसके लिए हम भगवान के आगे माथा टेकते हैं, परन्तु इस बार मामला थोडा उल्टा हैं। ना इस बार पूजा-अर्चना की, ना फूल चढाए बल्कि भगवान को सफाई के नाम पर मैट्रो के खम्भो के चारो और तस्वीरों का रूप में चिपका दिया।  मजे वाली बात यह कि जिन खम्भो पर उनकी तस्वीरे लगी हैं। वहां- वहां अब कोई थूकता नही हैं, न ही कोई उसे पेशाब घर बनाता हैं। जहां पर ये मैट्रो के पिलर मौजूद हैं वही पर दो बडी कम्पंनियो के कार्यालय भी हैं। भारत पेट्रोलियम में कार्यरत गार्ड महेशचन्द्र से जब मैने इस विषय में बात की, तो उसने बताया कि इन तस्वीरो से पहले इन खम्भो का बुरा हाल था। पान-गुटके की पीक से खम्भे रंगे रहते थे। कुडा-करकट खम्भो की शान था और बदबू कुडे के साथ मिले रूंगे के समान मुफ्त मिलती थी।

खैर भगवान ने अपना मोर्चा सही सम्भाला हुआ हैं। उनके सामने किसी की मजाल ही क्या कि वह खम्भो को उनके पुराने दौर में ले जाए। यह जिम्मेदारी केवल अकेले हिन्दू भगवान ने नही ली बल्कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मो के ईश्वर अपनी जिम्मेदारी मिलजुलकर निभा रहे हैं।

देखा जाए तो ये खम्भे स्वच्छता के लिए, इस्तेमाल हुए फोर्मुले की मिसाल बन सकते हैं। वह कहावत तो सुनी होगी आपने- हिंग लगे ना फिटकरी रंग चौखा आवे।  य़ानी बिना किसी ताम झाम के और किसी की मदद लिए बगैर आप इस नुस्के का इस्तेमाल कर सकते हैं। जहां भी आप गन्दगी देखे और साफ करने की तमाम कोशिश नाकाम हो जाए। तब इसको अपनाना चाहिए। सफलता जरुर मिलेगी।
  
एक बात ओर गौर करने वाली हैं। लोग शासन-प्रशासऩ से डरे या ना डरे भगवान से आज भी डरते हैं। शायद इसलिए हमारे पूर्वजो ने गलत कार्य को पाप की श्रेणी में रखा था और अच्छे कार्य को पुण्य में।


Sunday, 11 September 2016

दोस्ती का मैं तुझे क्या पैगाम दूँ



दोस्ती का मैं तुझे क्या पैगाम दूँ, 

तू समझता है मुझे, मैं तुझे क्या इनाम दूँ,


सारी दुनिया वो देखती, जो दीखता हूँ


इक तू ही हैं जो मैं हूँ, वो मैं हूँ।।




Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Thursday, 4 August 2016

पाकिस्तान के यार देश के गद्दार



हाल ही में हुए जम्मू-कश्मीर के चुनाव में 'पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी'  की नेता महबूबा मुफ़्ती के खिलाफ खड़े हुए, नेशनल कांफ्रेंस के नेता इफ्तिखार हुसैन मिसगर ने मुख्यधारा की राजनीती को अलविदा कह दिया और भारत विरोधी नारो का समर्थन किया जो उनके निवास स्थान के बाहर लग रहे थे। 

मिसगर ऐसे पहले राजनीतिज्ञ बन गए है जिसने मुख्यधारा की राजनीती को अलविदा कह दिया है। उनका त्यागपत्र तब आया जब हुर्रियत कांफ्रेंस ने सभी भारत समर्थक राजनितिक पार्टियों का सामाजिक बहिष्कार का आहवान किया था। मिसगर ने कहा-"मुझे कोई सुरक्षा नहीं चाहिए, मुझे मेरे लोगो की सुरक्षा चाहिए।"  ये उसने अनन्तनाग में लोगो को सम्बोद्वित करते हुए कहा।

उसने भारत विरोधी नारे लगाते हुए कहा- " भारत के आवानु में आग लगा दो आग लगा दो " 
ऐसा ही एक नारा और दिया गया " भारत का जो यार है गद्दार है गद्दार है।" 
इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक मिसगर से बार-बार संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन बात नहीं सकी। पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का गढ़ माने जाने वाला अनंतनाग में प्रदर्शन के दौरान 8 जुलाई से अब तक 20 से ज्यादा लोग मारे गए जबकि 559 घायल हो गए। 

Tuesday, 2 August 2016

तमाम उम्र गवा दी नाराजगी में



तमाम उम्र गवा दी नाराजगी में ,
जिनसें नाराज हुए, उन्हें इल्म तक नही ,

बहुत छोटी है जिंदगी इन बातो के लिये 
कुछ तुम चलो, कुछ हम चले,

संवाद न हो तो कोई बात नही 
बैठ पास कुछ  तुम कहो, कुछ हम कहे,

भूल जाओ किस ने क्या कहा 
कुछ हम मिले कुछ तुम मिलो,

किस को क्या मिला, अपने अहंकार से
कुछ तुम झूको , कुछ हम झुके,

कौन कब तक टिका, खुले आकाश में
कुछ सहारा तुम बनो, कुछ हम बने,

लापरवाहिया बहुत हैं इस सफर में 
कुछ परवाह तुम करो, कुछ हम करे 

मुश्किलो  मे साथ छोडना, आसान हैं ,
कुछ तुम रहो कुछ हम रहे,

कब तक नाराजगी का बोझ उठाओगे,
कुछ तुम हंसो कुछ हम हंसे 

बहुत आएंगे ये  कहने वो कहने वाले 
कुछ भरोसा तुम करो, कुछ कुछ हम करे 

हाँ  हम कुछ नाराजगी रखते हैं ,
कुछ तुम मनाओ, कुछ हम मनाए ॥ 



Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Sunday, 27 March 2016

कोई दर्द देख बढ़ता है आगे




कोई दर्द देख बढ़ता है आगे, कोई दर्द में भी देखता है फायदे,
कोई छोड़ देता है रोता  किसी को, 

कोई लेता है चित्र, ओर  बेचता किसी को,

कोई उठाता है रोते हुए को, कोई छोड़ता है रोते सभी को, 

ये दुनिया के दस्तूर, ये दुनिया की बाते, 
कोई ढूंढ लेता है, इसमें भी खुद को॥  



Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Wednesday, 9 March 2016

आतंकियों को मकबूल बट याद है, क्या आपको रविन्द्र म्हात्रे याद है ?


पुणे मे हर दिन हजारों वाहन "म्हात्रे" पुल से गुजरते हैं लेकिन उन मे से शायद 10% लोग भी नही जानते होंगे कि ये म्हात्रे कौन थे।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मे कुछ बुद्धिजीवियों ने कुछ दिन पहले प्रदर्शन किये और अफजल गुरु और मकबूल बट को शहीद कह कर घोषणाएं की।

मकबूल बट को सामान्य जनता भूली होगी मगर ऊग्रवादी भूले नही।  कश्मीर घाटी के पुराने हिंन्दू जो भट्ट थे वही धर्मपरिवर्तन के बाद बट हो गये थे।

14 सितंबर 1966 को पाकिस्तान की सहायता से इस मकबूल बट ने पुलिस बल पर हमला किया जिस मे इंन्स्पेक्टर अमरचंद मारे गए।  1971 के विमान अपहरण कर लाहोर ले जाने मे भी इस मकबूल बट की मुख्य भूमिका थी।  तब यह पाकिस्तान मे रहता था।

1976 मे भारतीय सेना ने पकडा और फिर इसे फांसी की सजा हुई। उसने भारत के राष्ट्रपती से क्षमा याचना की।

3  फरवरी 1974  को इसके साथियों (Jammu Kashmir Liberation Front) ने लंडन मे भारतीय उच्चायोग के श्री रवींद्र म्हात्रे का अपहरण किया।  श्री म्हात्रे अपनी छोटी सी बेटी के जन्म दिन का केक ले कर घर आ रहे थे और बस से उतरे थे। यहीं से अपहरण कर आतंकियों ने मकबूल बट को रिहा करने की मांग की।

तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने यह मांग नही मानी और स्पष्ट कर दिया कि भारत सरकार आतंकियों से कोई बातचीत नही करेगी। तब 6 फरवरी 1984 को इन आतंकियों ने श्री म्हात्रे का कत्ल कर उनके शव को सडक पर फेंक दिया।

तब श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपती श्री जैल सिंह को दया याचना को  नामंजूर करने की सिफारिश की, 5 दिन बाद 11 फरवरी 1984 को मकबूल बट को फांसी पर चढा दिया।

रवींद्र म्हात्रे के बूढे माता-पिता मुंबई के विक्रोळी मे 3 कमरे के मकान मे रहते थे।

 श्रीमती गांधी उन्हे मिलने मुंबई गईं और हवाई अड्डे से सीधे विक्रोळी गईं।  म्हात्रे के बूढे पिता का हाथ 15 मिनट हाथ मे लेकर बैठीं और सांत्वना दी।  दोनो की आंखों मे पानी था।  श्रीमती गांधी ने देश को महत्व दिया था जिस से म्हात्रे को जान गवानी पडी।  इस के लिये खुद को दोषी मान कर क्षमा मांगी और सीधे हवाई अड्डे से दिल्ली वापस आईं।

4 नवंबर 1984 को इन्ही आतंकियों ने मकबूल बट को फांसी की सजा देने वाले जज "नीलकंठ गंजू" की हत्या कर दी.

ये आतंकवादी 30 साल बाद अभी भी मकबूल भट को भूले नही मगर हम श्री रवींद्र म्हात्रे को भूल गए....

चलिये हम आज उन्हे, श्री म्हात्रे, नीलकंठ गंजू और इंस्पेक्टर अमरचंद को याद कर अपनी श्रद्धांजली दें.

#प्रतिलिपि