Sunday, 18 December 2016

क्या चाहता हूं मैं आसमां या ज़मी


क्या चाहता हूं मैं, आसमां या ज़मी,
क्यों मुस्कुराता हूं मैं, क्यों हैं ये हंसी।

जंमी पर आसमां के सपने है मेरे,
जब थकता हूं याद आती हैं ये जंमी।

उलझनों में उलझा रहता हूं,
मंजिल की तलाश में,कभी हार हैं कभी जीत
मैं उदास क्यों हूं, मैं इसकी तलाश में हूं

किस फेर में पड़ा हूं,
क्यों ये आसमां क्यों ये जमीं।

ख्याल रहता है, रब तेरा भी,
क्यों पाऊ आसमां क्यों ये ज़मीं।

क्या साबित करना है मुझको,
क्यों न बनू खुद आसमां ये ज़मीं।। 


Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

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