Tuesday, 28 November 2017

रोहित के सवाल पर बवाल क्यों ?




हाल ही में रोहित सरदाना के एक ट्वीट पर बहुत बवाल होते देखा तो मन किया एक बार फिर से ट्वीट को पढ़ लिया जाए। ट्वीट में सरदाना ने पांच नामों का जिक्र किया है। ये नाम है राधा, दुर्गा, फातिमा, आयशा और मेरी। यहां तक तो सब ठीक था। पर कुछ तथाकथित बुद्धीजीवियों से सवाल पूछते हुए उन्होंने इन नाम के आगे सैक्सी शब्द का विशेषण लगा दिया। अब एक धर्म विशेष के लोगों की भावनाएं इस पर आहत हो गईं। लेकिन असल मुद्दा इस हो-हल्ले में गोण हो गया। सरदाना का सवाल तो जस का तस बना हुआ है।

Thursday, 7 September 2017

गौरी लंकेश की हत्या...


मैं पेशे से पत्रकार हूं इसलिए आज जब किसी पत्रकार की हत्या की खबर सुनता हूं तो मुझे ऐसे लगता है जैसे मेरे ऊपर ही हमला हुआ हो । गौरी लंकेश की हत्या जिसने भी की है, वह अपराधी है। उसे हर कीमत पर सजा मिलनी ही चाहिए। इसमें कोई दोराय नहीं है। किसी की हत्या को कोई भी भाषा या शब्दावली का इस्तेमाल कर न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। पत्रकार की अपनी विचारधारा हो सकती है। वह अपने आप को किसी भी विचारधारा के नजदीक पा सकता है। मेरी बोद्धिक क्षमता के अनुसार यह गलत नहीं है। 

गलत यह है जब खबर देते या लिखते समय, खबरों में अपनी विचार धारा का मिश्रण किया जाए। गलत यह है- जब एक समुदाय की गलती को छुपा लिया जाए और दूसरे की गला फाड़ के चिल्लाया जाए। यह सब गलत है। पत्रकार का काम सत्य और तथ्य को सबके सामने रखना है। न्यायाधीश बनकर जजमेंट सुनाना नहीं।
मै पत्रकारों की जमात में नया हूं। मुझसे अभी बहुत गलती होती होगी। शायद आगे भी हो क्योंकि मैं इंसान हूं । गलती कर के ही सीखता हूं। कभी खुद की गलती से कभी दूसरे की गलती से। पर हां, सीखने की कोशिश जरूर करता हूं। लेकिन, कभी मैं जजमेंट नहीं सुनाता। जैसे इस हत्या के बाद सुनाया गया है। खैर पुलिस अभी भी जांच कर रही है। हत्या किसने की प्रारंभिक जांच में उन्हें नहीं पता। पर राहुल गांधी को पता है। बड़े टीवी चैनलो के कुछ बड़े पत्रकारों को भी पता है कि हत्या किसने की है। 

Friday, 28 July 2017

आज राजनीति मतलब ‘राज’ करने की ‘नीति’



बिहार के ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आज के दौर की राजनीति में कोई सिद्धान्त नही हैं। आज राजनीति केवल ‘राज’ करने की ‘नीति’ तक सीमित हो गई है। सिद्धान्त का झुनझुना जनता को बहलाने का बस साधन भर है । 


राजनीति के पंडित आज नीतीश के कदम पर सवाल उठा रहे है, वो लोग तब ब्रह्मज्ञान से वंचित हो गए थे, जब बीजेपी के साथ 17 साल पुराने गठबंधन को तोड़, नीतिश कुमार ने  चिर प्रतिद्वंद्वी लालू यादव से गलबहियां कर आरजेडी से गठबंधन किया था। तब भी अवसरवादिता थी लेकिन तब राजनीतिक बुद्धिजीवियों को इस कदम में सिद्धांत और सेकुलरइज्म नजर आए थे, लेकिन आज कोरी अवसरवादिता। कुछ ने इस कदम को मास्टर स्ट्रोक बता नीतीश कुमार को राजनीति का माहिर करार दिया। जब हमारी सोच में ही सिद्धांत और सच्चाई नहीं है जहां पर कथनी और करनी में अंतर रखने वाले को ही राजनीति में शातिर खिलाड़ी माना जाता है। तो बाकी बचा ही क्या है?

Tuesday, 25 July 2017

असफलता से सफलता की ओर



आज दुनिया पहले की तुलना में काफी बदल चुकी है। हर दिन के साथ, इसके बदलने की रफ्तार बढ़ती ही जा रही है। बदलाव संसार का नियम भी है और जरूरत भी। उसी तरह, कुछ लोग किसी की सफलता और असफलता का पैमाना किसी एक हार जीत से लगाने लग जाते है। यही दबाव व्यक्ति को असफलता के बाद तोड़ने लग जाता है। कुछ इसे झेलने में कामयाब होते है तो कुछ टूट जाते है। बस, यही वक्त होता है अपने आप को सभालने का, अपने व्यक्तित्व में निखार लाने का। जब तक आप जीवन में असफलता का स्वाद नहीं चखते तब तक आप व्यक्तित्व की उस गहराई तक नहीं पहुंचते, जहां पर आप दूसरे व्यक्ति की सफलता की कद्र करना नहीं सीखते। यहीं, वह भावना है जो आप को जमीन से जोड़े रखती है। कोरी सफलता बिन डोर की पतंग जैसी होती है जो अच्छे समय की हवा में आसमान की बुलंदियों को छूती है लेकिन बूरे समय की शून्यता उसे क्षण भर में जमीन पर लाकर पटक देती है।

असफलता का अर्थ यह कभी नहीं होता कि आप काबिल नहीं है। बल्कि, हम इसे खुद जान सकते है कि असफलता हाथ क्यों लगी ?  इसका पहला तरीका यही है कि. क्या कार्यसिद्धी के लिए हमने पूरे मनोवेग से मेहनत की। दूसरा, जिसके लिए हम मेहनत कर रहे है क्या हम वह सच में चाहते है? तीसरा, जो लोग आपकी काबीलियत की जांच रहे हैं, क्या उनका काबिलीयत नापने का पैमाना ठीक है? तीसरा कारण आपको कुछ अटपटा सा लगा होगा। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि आप असफल इसलिए हुए है कि आप काबिल नहीं हैं बल्कि यह भी हो सकता है कि सामने वाला आपको सही परख ही नहीं पाया हो।

अमिताभ बच्चन आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं लेकिन एक वक्त था कि उनकी लाख कोशिशों के बाद भी, उन्हें जीवन में कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। उनमें से ही एक किस्सा है, जब वह ऑल इंडिया रेडियों पर काम के सिलसिले में गए लेकिन असफल हो गए। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने यह माना भी कि वह तीन बार रेडियो उद्घोषक बनने के लिए ऑल इंडिया रेडियो गए लेकिन कामयाब नहीं हो सके। अगर दूसरे पहलू को देखें तो यह अच्छा ही हुआ, नहीं तो, फिल्म जगत को एक मेगा स्टार से वंचित रहना पड़ता।

इसलिए हम कह सकते है कि असफलता कई बार आपको गढ़ती है, तराशती है और निखारती है जो सफलता के लिए जरूरी है। दूसरे शब्दों में, असफलता कई बार आपको सफलता की और लेकर जाती है। बशर्ते कोशिश जारी रहनी चाहिए।


  

Tuesday, 11 July 2017

अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला


अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले ने एक बात तो तय कर दी है कि अब हमले की कड़ी निंदा करने का समय निकल गया है बल्कि कड़े फैसले लेने का समय आ गया है। आए दिन हो रहे आंतकी हमलों मे मरते जवानों से भारतीय जनता का सब्र अब टूट रहा है। विपक्ष में रहते हुए पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने का ख्वाब देखने वाले अब क्यों सिर्फ कड़ी निंदा कर, हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाते है।

Sunday, 9 July 2017

गुरू बिन ज्ञान नहीं


गुरू बिन ज्ञान नहीं, गुरू बिन ध्यान नहीं,
गुरू बिन सही-गलत की पहचान नहीं,
गुरू घर भेद नही, गुरू से विच्छेद नहीं,
गुरू एक आस है, गुरु विश्वास है,
गुरू रक्षक है, गुरू मार्गदर्शक है,
गुरू-शिष्य हर संबंध से खास है,
गुरू कड़ी धूप में शीतलता का एहसास है,
गुरू उर्जा पुंज है, गुरू विचार कुज है,
गुरू जीत का दांव है, गुरू डुबते की नाव है
गुरू एक कृतिक है, गुरू ही संस्कृति है
गुरू का कोई मेल नहीं, गुरू बनना कोई खेल नहीं।।

Tuesday, 20 June 2017

नारों में सिमटा ‘बेटी पढ़ाओं बेटी बचाओं’ अभियान


हम ‘बेटी पढ़ाओं बेटी बचाओं’ का खूब नारा लगाते हैं पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है। बिहार के बेगूसराय की घटना जिसमें स्कूल की दो छोटी बच्चियों की ड़्रेस उतरवाकर उन्हें अंड़रगार्मेंटस में ही घर भेज दिया गया, क्योंकि गरीब पिता ने यूनिफॉर्म की राशि समय पर जमा नहीं कराई। इस तरह की घटना आज के आधुनिक समाज पर एक जोरदार तमाचा है जो यह समझाने के लिए काफी है कि जमीन पर अभी काफी कुछ करना बाकी है। हालांकि इस घटना के आरोपी प्रिंसिपल और टीचर को गिरफ्तार कर लिया गया है और बिहार राज्य शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी ने घटना की निंदा की है और जांच के बाद दोषियों को सजा की बात भी कही है। पर क्या वह इस बात का आश्वासन दे सकते है कि ऐसी घटना बिहार में फिर नहीं घटेगी? शिक्षा तंत्र की खामियों को लेकर बिहार पिछले दो साल से सुर्खियों में बना हुआ है। अगर एक्शन की बात करें तो एक्शन के नाम पर सिर्फ जांच का आश्वासन है। केंद्र सरकार भी शिक्षा बजट में केवल मामूली बढ़त की है जो भारत जैसे देश में केवल ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। समाज को आगे बढ़ाने में जो सबसे बड़ा हथियार बन सकता है, वह है शिक्षा। अगर हम नौ लाख करोड़ रूपये बिजनेस हाउस का माफ करते है, तो क्यों नहीं हम एक ऐसा तंत्र विकसित कर सकते, जिसमें जीवन की बुनियादी चीजों को गरीबो के लिए मुफ्त कर दें जैसे शिक्षा और चिकित्सा। ताकि भारत का कोई भी नागरिक इनके अभाव में अपना जीवन न गवाएं।   

Sunday, 18 June 2017

पापा मैं अब बड़ा हो गया हूं


पापा मैं अब बड़ा हो गया हूं,
मै आप जैसा हूं या आप हो गया हूं,
सब लोग बोलते है बाप पर गया है
आप को लगता है, मैं आप पर गया हूं

मेरी नादानियों के मौन गवाह हैं आप,
जानते हुए भी अंजान हैं आप,
कितनी ही मुश्किलों से लड़ा हूं मैं,
जानता था कि पीछे खड़े हैं आप,

मैं कितना सीखा हूं आप से,
ये भूल जाता हूं,
मैं अब इतना बड़ा हो गया हूं कि,
आप को सिखाता हूं,
कई शब्द चुभते होंगे मेरे,
सच कहूं, मैं बाद में पछताता हूं।।

Saturday, 10 June 2017

कहीं किसान मरा


गजब का माहौल हो गया,
कहीं किसान मरा,
कहीं राजनीतिक गोल हो गया,

परिवार की फिक्र किसे,
वोटो का ये धंधा है,
आँखे तो सबकी है,
इंसान अब अंधा है,

गरीब के हिस्से भूख आई,
अमीर के हिस्से रोटी,
जिसको जितनी चाहिए
उसकी ही किस्मत खोटी,

सत्ता और विपक्ष में,
मचा घमासान है,
होना-वोना कुछ नहीं
दो दिन का ये नामोनिशान है,

लाशों पर गिद्ध नहीं
अब नेता मंडराते हैं,
अपने यहां कुछ नहीं होता,
दूसरे को गलियाते हैं,

काश के संसद उड़ जाती
नेताओं की नई पौध आती

अब पुराने पेड़ो के कीड़े,
पौधों मे आ गए,
सिर्फ चेहरे बदले है साहब,
नेता वहीं पुराने आ गए।।



Sunday, 28 May 2017

आंदोलन का ट्रेंड़


मुझे आज कल एक चीज बहुत महसूस हो रही है शायद आपको भी हो रही होगी शायद नहीं भी कि अन्ना आंदोलन के बाद हमारे देश मे आंदोलन करने का एक ट्रेंड निकल पड़ा। हर दो चार महिने बाद कोई भी कही भी खड़े होकर तीन-चार अपनी पसंद के नारे लगाता है, विरोध करता है। 4-5 गंभीर समस्याओं की सूची अपने मुखार बिन्द से गिनाता है। अपनी कौम, अपनी जाति, अपने धर्म की बात करता है। देश का सच्चा नागरिक होने की और सविधान की कसमें खाता है। संविधान सभा के चेयरमैन रहे ड़ा भीमराव अंबेड़कर का नाम लेता है। गरीबो, मजबूरों, शोषितों, दलितों के हित के लिए लड़-मरने की बात करता है। कुछ दिन बाद उसके सोशल मीडिया पर कैंपेन चलते है लोगों को उसके बारे में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बताया जाता है कि यह वही शख्स है जो आपके अधिकारों के लिए लड़ रहा। कल तक उसके मौहल्ले के आखिरी मकान में रहने वाला आदमी, उस कथित नेता का नाम तलक नहीं जानता था। लेकिन कुछ दिनों में ही वह सोशल मीडियां में ट्रेंड करने लगता है। जब वह माल (खबर) बाजार में बिकने लायक बन जाता है। उसके बाद वह मुख्य मीडिया पर आना शुरू हो जाता है। अब उसे उसके मौहल्ले वाले ही नहीं बल्कि उसे वो लोग भी जानने लगते है जो उसके मौहल्ले के नहीं है। फिर उसके टीवी पर आने जाने का सिलसिला शुरू होता है। उसके कौम वाले, उसकी जात वाले, उसके धर्म वाले उसे ऐसे देखते है जैसे वह बहुत बड़ा समाजसेवी हो।

जबकि वह फल है उस नकारात्मक राजनीति का और विकृत चेहरा है हमारी समाचार पत्रों की मानसिकता का। जो बड़े चाव से इस तरह के कच्चा माल समाज से उठाते है और उसमें अपनी पसंद का फेर बदल करके फिर दुबारा उसे उसी बाजार में बेचते हैं। क्योंकि न्यूज, खंबर  यह समाचार पत्रों, चैनलों के लिए बस एक उत्पाद है। जिसे मिर्च-मसाला लगाकर अपनी पसंद के बाजार, और निर्धारित दर्शको को बेचा जाता है तभी तो उनकी दुकान चलेगी। यह लोग तर्क-वितर्क नहीं करते बल्कि अघोषित मुद्दे को घोषित मुद्दा बनाकर पेश करते है।  यह इन तथा कथित नेताओं से तीखे सवाल पुछने कि हिम्मत नहीं करते। वह उन्हें आइना भी नहीं दिखाते ताकि कल को उनका कच्चा माल (खबर) खराब न हो जाए। बल्कि उनका नामकरण कर देते नेता के रूप में।

अन्ना आंदोलन के बाद निकली नई पार्टी, फिर पाटीदार आंदोलन और अब यह भीम आर्मी वही कच्चा माल है जिसे न्यूज वाले बाद में पका पका कर खाएंगे। इससे दोनों के हित सध रहे है। एक शॉर्ट कट तरीके से नेता बन जाता और दूसरे को समाज में बेचने के लिए नया उत्पाद मिल जाता है।  

Saturday, 27 May 2017

कूड़े में भविष्य तलाशता बचपन...



बचपन और खेल एक दूसरे के पूरक माने जाते है। बच्चें जहां हो, जैसे हो वह खेल व खेलने का समय ढूंढ ही लेते है। चाहे वह पढ़ाई करते हो या घर की मजबूरी के चलते मजदूरी, वह खेलना नहीं भूलते। लेकिन कुछ बच्चों का बचपना बाल मजदूरी की भेंट चढ़ जाता हैं।

मां-बाप का दुलारा जिसे अभी ढंग से बोलना नहीं आता जो अभी दुनिया की दौड़ को जानता नहीं है। जिसके पैर चलते हुए भी लडखडाते है जो दुनिया की चाल से अभी वाकिफ नहीं हैं, जिसे मां का आंचल ही अपनी सारी दुनिया लगता है। जो पेट में होती कसन को सही परिभाषित नहीं कर सकता कि यह भूख है या कुछ और। घर से बाहर काम के लिए निकलता है। जिसका बचपन इतना मासूम है कि वह यह भी नहीं जानता कि जो काम वह रोजाना करता वह केवल उसकी ही नहीं बल्कि उसके मां-बाप की भी मजबूरी का परिणाम है।


काम पर अनायास ही जब कभी उसका मन खेलने के लिए मचलता, एक भारी आवाज उसे टोक देती। वह मन मसोस कर बैठ जाता लेकिन कुछ देर बाद फिर यही क्रम होता है। धीरे-धीरे उसकी कल्पना, उसकी इच्छा दम तोड़ रही होती है। जिसको वो जानते हुए भी पहचान नहीं पाता। वह यह जानता ही नहीं है कि उसका भविष्य दो जून की रोटी के लिए कुर्बान हो रहा है। बचपना कब खत्म हो गया उसे पता ही नहीं चला। वह पीछे मुडकर देखता है तो उसे नजर आता है कुड़े में भविष्य तलाशता अपना बचपन... 

Wednesday, 24 May 2017

शब्बीरपुर हिंसा के पीछे का सच

महाराणा प्रताप की जयंती मनाने के लिए 5 मई को शब्बीरपुर के 20-25 युवक तेज आवाज में गाना बजाते हुए, पास के ही शिमलाना गांव जा रहे थे। शब्बीरपुर गांव के प्रधान ने तेज आवाज पर आपत्ति जताई व अपने साथियों समेत उसे रोकने की कोशिश की साथ ही पुलिस को इस बाबत सूचना दे दी। प्रधान का कहना था कि कार्यक्रम के लिए प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई थी। गांव का प्रधान अनुसूचित जाति का है। एसएसपी सुभाष चन्द्र दुबे के मुताबिक पुलिस ने मौके पर पहुंच कर डिजे बंद करवाया व उन्हें शिमलाना गांव के लिए रवाना करने लगे।  इसी दौरान कार्यक्रम में जाते लोगों (राजपूतों) पर छतों के ऊपर से दलित समुदाय के लोगों ने पथराव शुरू कर दिया । जिसमें राजपूत समुदाय के 16 लोग घायल हो गये व सुमित सिंह नाम के 27 वर्षिय राजपूत युवक की मौत हो गई। इसकी सूचना जब शिमलाना कार्यक्रम में मौजूद राजपूतों को पता चली तो वह बड़ी संख्या में आए और उन्होंने दलित समुदाय 15-20 घेरों ( वह स्थान जहां पर भुस व पिटौड़ा आदि रखे जाते हैं) में पथराव और आगजनी की। तभी से दोनों समुदाय के बीज तनाव की स्थिति बनी हुई है।

 

डीएम नागेंद्र व एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे ने बताया कि 9 मई को भीम आर्मी नाम के दलित संगठन ने सहारनपुर के गांधी पार्क में बिना अनुमति के 5 मई की घटना के खिलाफ महापंचायत का आयोजन रखा। जब पुलिस बिना अनुमति के हो रहे आयोजन को रोकने पहुंची तो वे लोग उग्र हो गए। उन्होंने वाहनो और पुलिस पर पथराव शुरु कर दिया, जिसमें ड़ेढ़ दर्जन बाइक, दो बसे, तीन कारें जलकर खाक हो गई। बस में मौजूद 46 यात्रियों ने किसी तरह अपनी जान बचाई। यात्रियों के मुताबिक 8-10 नकाबपोश लोगों ने इस घटना को अंजाम दिया। एसपी सिटी और पत्रकारों पर भी हमला किया गया।

21 मई को हालात का जायजा लेने बसपा सुप्रीमो मायावती भी सहारनपुर के शब्बीरपुर व और चन्द्रपुरा पहुंची लेकिन उनके पहुंचने से पहले ही चंद्रपुरा के दलितों ने राजपूतों के घर पर पथराव व आगजनी की। उसके बाद राजपूतों ने भी अपनी तलवारें निकाल ली। हालात एक बार फिर तनाव पूर्ण बन गए।

 

5 मई के बाद से एक के बाद एक हुई घटनाक्रम पर नजर डाली जाए तो यह एक बढ़ी राजनीतिक साजिश लगती है। भीम आर्मी की भूमिका  भी संदिग्थ है। भीम आर्मी के मुखिया चन्द्रशेखर आजाद ने एक ऑडियो रिलीज किया जिसमें अपने सभी दलित भाईयों को 21 मई को जंतर-मंतर पर इकठ्ठा होने का आह्वान किया। इस ऑडियो क्लिप में वह अपने आपको ‘एडवोकेट चन्द्रशेखर आजाद रावण’ कहता है। इसके बाद ‘नीला सलाम’ कहकर ऑडियो खत्म करता है। नीला सलाम ‘लाल सलाम’ से बहुत मेल खाता है। अपने नाम के साथ ‘रावण’ जोड़ना और हक की लडाई की बात करते हुए नक्सल आंदोलन को सही ठहराने की कोशिश करना और वामपंथियों संगठनों की तरफ से भीम आर्मी को मिल रहे समर्थन से लगता है कि यह समाज को बांटने साजिश की जा रही है।

 

आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता डे ने आईएएनएस से कहा, “हमारी मांग है कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद पर लगाए गए आरोप वापस लिए जाएं और दलित ग्रामीणों को निशाना बनाने वाले और उनके घरों को जलाने वाले तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।” जिस प्रकार इसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी) की छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन के सदस्य विरोध-प्रदर्शन में सक्रिय हैं व आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष के बयान आ रहे हैं उससे दो समुदाय के बीच की खाई और बढ़ रही है।  

 

अब आप सोच रहे होगे कि अभी कोई चुनाव भी नहीं है तो इस में राजनीतिक साजिश का क्या औचित्य है?  यही समझने वाली बात है- उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा अपनी जमीन खोते जा रहे है। बड़ी संख्या में मुस्लिम और दलित बीजेपी का रुख कर रहे हैं और अब वामपंथी विचारधारा से भी अधिकतर युवाओं का मोह भंग हो रहा है और भाजपा को यूपी व देश के अन्य भागों में स्वीकारा जा रहा हैं। वह विपक्ष के लिए खतरें की घंटी हैं। इसी से पार पाने के लिए यह एक सोची समझी साजिश नजर आ रही है। अपने गिरते वोट बैंक और भाजपा के बढ़ते कद से निजात पाने के लिए, अपने वोट बैंक को एकजुट करना आवश्यक था। 2019 में भाजपा के विजयरथ को रोकने के लिए और हिंदु समाज के एक वर्ग को सर्वण समाज का ड़र दिखाकर काटना जरूरी था। दलित अस्मिता और अम्बेड़कर के नाम पर भीम आर्मी का मुखिया जिस प्रकार केंद्र में मोदी और प्रदेश में योगी पर सवाल खड़े कर रहा है। उसके अपने बयानों में मुस्लिम व दलितों की बात करना इस बात की पुष्टि करता है कि यह कोई दलित आंदोलन नहीं बल्कि साजिश है। जिसका आज नहीं तो कल सच सामने आ जाएगा। 

 

Tuesday, 23 May 2017

दोस्ती महज अफवाह है साहब


जो चाहा तुम में मिला नहीं
वरना,मिलने में कसर कोई बची नहीं,
जब छोड़ चुके थे साथ तेरा हम
ऐसी कोई कमी नहीं जो तुम्हें हम में मिली नहीं,

ऐसा भी नहीं की हमने बहुत चाहा तुमसे
                     बस हमारी तबियत तुमसे मिली नहीं,

दोस्तों के आगें तुम मुझे बदनाम करते हो
हमने दिन-को-दिन कहा,ये बात हमारी तुम्हें जमीं नहीं,

मैं सपनों में जिया नहीं करता
हकीकत में तुम मेरी, थी ही नहीं,

मैं आज के इश्क को इश्क नहीं मानता
दो बर्गर ना खिला पाए, वो मेरा साजन नहीं,

अब तो रिश्तों में लेन-देन की बात होती है
अब लोग कहां वो, जो दे दिया सो दे दिया 
पीछे परवाह की नहीं,

दोस्ती महज अफवाह है साहब
बस सीढ़ी का, कोई दुसरा शब्द मिला नहीं,

भले ही लाख सच्चे हो तुम
झूठ की दुनिया में तुम्हारी कोई कीमत नहीं,

मैं अकेले चले जा रहा हूं
मुझे भी किसी और की जरूरत नहीं,

यकीं है मुझे मेरे खुदा पर
औरों की अब मुझे भी फिकर नहीं।।




Monday, 22 May 2017

अभी स्वच्छ दिल्ली दूर है...


भारत सरकार भले ही स्वच्छ भारत अभियान को जन आंदोलन बनाने के लिए प्रयासरत है लेकिन कहीं न कहीं अब यह आंदोलन दम तोड़ता नजर आ रहा है। केवल जन भागीदारी से इस अभियान को सफल नहीं बनाया जा सकता। इसमें सरकार की भूमिका की भी उचित भागीदारी आवश्यक है। हाल ही में, देश के 434 शहरों का सर्वे हुआ, जिन्हें साफ-सफाई के विभिन्न मानकों पर परखा गया। इसमें देश की राजधानी ही साफ-सफाई की सूची में पहले 50 में अपना स्थान नहीं बना पाई तो देश के बाकी आम शहरों से क्या उम्मीद की जा सकती है?

फिर भी इस सूची में मध्य प्रदेश का इंदौर शहर पहले स्थान पर जगह बनाने में सफल रहा जबकि मध्य प्रदेश का भोपाल व आंध्र प्रदेश का विशाखापटनम क्रमश: दूसरे व तीसरे स्थान पर रहे। उत्तर प्रदेश का गोंडा फिसड्डी साबित हुआ। गुजरात के 12 व मध्य प्रदेश के 11 शहर टॉप 50 शहरों की सूची में शामिल है। उत्तर प्रदेश का वराणसी को अगर छोड़ दे तो कोई भी शहर टॉप 50 में स्थान नहीं बना पाए और हरियाणा का तो एक भी शहर नहीं है। अगर आंकड़ो को ध्यान से देखे तो जो शहर सूची में टॉप रहे, वहां की जनता के साथ-साथ सरकार भी धन्यवाद की पात्र हैं।

देखनी वाली बात यह भी है कि जनता हो या सरकार इनकी प्राथमिकताओं में साफ-सफाई कभी नहीं होती। इस मानसिकता को बदलने की जरूरत हैं। केवल मानसिकता ही नहीं बल्कि गांव शहरों की सफाई के लिए आधुनिक तकनीक के साथ-साथ वर्कफोर्स को भी बढ़ाना होगा। तभी हम 2019 में गांधी जी को उनकी 150 वीं जयंती पर स्वच्छ भारत व स्वस्थ भारत का तौफा दे सकेंगे।

जब तक सांस है मेरी, तब तक


मैं दर्द में खामोश हूं,
मेरा चिल्लाना तुमने सुना होगा,
तुम कहां हो, या अनजान बन गए हो तुम,
मैं शब्द में नहीं हूं, ना कभी रहा हूँ मैं,
मुझे भावनाओं में सुन सकती हो तुम,
                     शायद सुना भी हो                                                                                                                                                                                  
जैसे तुम मेरे अंतर मन में हो कही,
पर मेरी दुनिया में मर चुकी हो,
मैं अकेला होता हूं कभी-कभी,
जब अपने पास होता हूं ,

मुझे आज भी एहसास है,
उस आखिरी मुलाकात का,
क्या तुम्हें है,
हां हां तुम्हे तो होगा ही,
तुम तो सिसक जाती थी,
ये अनकही सच्चाई सुनकर..
वो सवाल तुम्हारे, जिनका उत्तर जानकर भी मैं,
खामोश रहता था,

मेरी चुप्पी में एक तुफान था,
शायद जिसे तुम देख न पाई,
बार-बार उठते वो चक्रवात,
तुम्हारे उस एक सवाल पर,
क्या हम अलग हो जाएगे?

मैं उस आंधियों को अपने में ही दबा लेता था,
तुम तक आती थी बस ठंड़ी हवा,
जो तुम्हें शांत कर देती थी,  पर कुछ पल के लिए,
 तुम्हे याद है वो सब, या वक्त के साथ वो भी पीछे छुट गया,
मुझ में कैद है वो अभी, शायद हमेशा, नहीं-नही, शायद नहीं हमेशा,
   जब तक सांस है मेरी, तब तक।।
                            
Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत (प्रिंट) किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

Wednesday, 10 May 2017

एक कैफे ऐसा भी...



दिल्ली: आपने हर तरह के कैफे व रेस्टोरेंट के बारे मे सुना होगा जो अपने ग्राहकों को लुभाने के लिए नए-नए ऑफर देते हैं। क्या कभी ऐसे कैफे के बारे में सुना है जो न केवल आपको स्वादिष्ट व्यंजन परोसता है, बल्कि वह आपको साइन लैंग्वेज भी सिखाता हो?

जी हां, ऐसा ही कैफे है साउथ दिल्ली के मोतीबाग में, जिसका नाम- “ईकोज कैफे” है। इसकी की खास बात है कि यहां काम करने वाला सारा स्टाफ मूक-बधिर हैं, जिनकी कुल संख्या 16 है। ग्राहक वेटर को बुलाने के लिए टेबल के पास ही मौजूद स्विच दबाते हैं, जिससे वेटर-रुम में लगा उसी टेबल नंबर वाला बल्ब जल उठता है और वेटर टेबल के पास जाकर ऑर्डर लेता है। यहां पर उपलब्ध मेन्यू कार्ड भी बिल्कुल अलग तरह का है। जिसे इस्तेमाल कर कस्टमर अपनी पसंदीदा चीजों का आर्डर दे सकते हैं। चम्मच, फोक इत्यादि वस्तु मंगाने के लिए प्ले कार्ड का इस्तेमाल किया जाता हैं।
यहां आने वाले ग्राहक खुश हैं। कैफे में आयी विनीता कहती है कि "उन्हें यहां आकर लगता ही नहीं कि ये लोग बोल और सुन नहीं सकते बल्कि यह चीजों को अलग तरह से प्रस्तुत करते हैं जो काफी आकर्षक होता हैं। मूक-बधिर लोगो को अपने पैरों पर खड़ा देख बेहद खुशी मिलती है"। उन्होंने बताया कि वह इस कैफे में आती है और अपने दोस्तों को भी यहाँ आने की राय देती हैं।  
कैफे के मालिक गौरव ने बताया कि "इसकी शुरूआत हम 6 दोस्तों ने मिलकर दिसंबर 2015 को की थी। कुछ अलग करने की चाह ने हमें यह आइडिया दिया। शुरूआती दिनों में हमें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा क्योंकि हमें खुद साइन लेंग्वेज नहीं आती थी इसलिए हमने पहले इसे सीखा और यहां के स्टाफ को भी सिखाया। अब सब आसान और सामान्य हो गया है। लोगों को यह कैफे बहुत भा रहा हैं। लोग बहुत संवेदनशील हैं। मूक- बधिर स्टाफ आकर्षण का केंद्र है।" उन्होंने बताया कि "हमने इसकी एक शाखा बेंगलुरु में भी खोली है, जिसने ग्राहकों के बीच जल्दी अपनी जगह बना ली है।"  



Saturday, 1 April 2017

अब गोबर गैस से चलेगी भारत में बस


देश की पहली मेट्रों ट्रेन कोलकाता में चली थी और अब गोबर से चलने वाली बस भी कोलकाता  में ही नहीं बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में बायोगैस से चलने वाली पहली बस है। इसके खर्चे की बात की जाएं तो यह एक रुपये में 17.5 किलोमीटर तक का सफर तय करेगी। एक तरह से यह देश में सस्ती परिवहन सेवा की शुरूआत है।

इस बस को लांच फोनिक्स इंडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट ग्रुप ने किया। यह कंपनी वैकल्पिक उर्जा क्षेत्र में कार्य करती हैं। ज्योति प्रकाश दास के मुताबिक तीन साल पहले हमने अक्षय ऊर्जा मंत्रालय के सब्सिड़ी प्लान के तहत यह परिकल्पना की थी जिसे आज मूर्त रूप दिया गया है।

इस बस की लागत 13 लाख रूपये है जिसे अशोक लीलैंड ने तैयार किया। इसमें 54 सीट है। यह एक किलो गोबर गैस में छह किलोमीटर का माइलेज देगी। इसमें तैयार लगने वाली गोबर गैस बीरभूम जिले के दुबराजपूर स्थित अपने प्लांट में तैयार करी जाती है। एक किलो गोबर गैस के उत्पादन पर 20 रूपये की लागत आती है। बस में जर्मन टेक्नोलॉजी वाला इंजन इस्तेमाल हुआ है।

Tuesday, 28 March 2017

वीर विक्रमादित्य


बड़े ही शर्म की बात है कि महाराज विक्रमदित्य के बारे में देश को लगभग शून्य बराबर ज्ञान है, जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था, और स्वर्णिम काल लाया था
उज्जैन के राजा थे गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी , सबसे बड़ी लड़की थी मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा वीर विक्रमादित्य…
बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पदमसैन के साथ कर दी , जिनके एक लड़का हुआ गोपीचन्द , आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , फिर मैनावती ने भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली।

आज ये देश और यहाँ की संस्कृति केवल विक्रमदित्य के कारण अस्तित्व में है अशोक मौर्य ने बोद्ध धर्म अपना लिया था और बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था, देश में बौद्ध और जैन हो गए थे।

रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया। विक्रमदित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा, जिसमे भारत का इतिहास है अन्यथा भारत का इतिहास क्या मित्रो हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे, उस समय उज्जैन के राजा भृतहरि ने राज छोड़कर श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , राज अपने छोटे भाई विक्रमदित्य को दे दिया , वीर विक्रमादित्य भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से गुरू दीक्षा लेकर राजपाट सम्भालने लगे और आज उन्ही के कारण सनातन धर्म बचा हुआ है, हमारी संस्कृति बची हुई है


महाराज विक्रमदित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है। विक्रमदित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमदित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे , आप गूगल इमेज कर विक्रमदित्य के सोने के सिक्के देख सकते हैं।

हिन्दू कैलंडर भी विक्रमदित्य का स्थापित किया हुआ है-


आज जो भी ज्योतिष गणना है जैसे , हिन्दी सम्वंत , वार , तिथीयाँ , राशि , नक्षत्र , गोचर आदि उन्ही की रचना है , वे बहुत ही पराक्रमी , बलशाली और बुद्धिमान राजा थे ।
कई बार तो देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे , विक्रमदित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे, न्याय , राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था विक्रमदित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी।

पर बड़े दुःख की बात है की भारत के सबसे महानतम राजा के बारे में इतिहास भारत की जनता को शून्य ज्ञान देता है,

कृपया आप शेयर तो करें ताकि देश जान सके कि सोने की चिड़िया वाला देश का राजा कौन था

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