मेरी राह निकल गई मंजिलो से आगे,
जहां सब ठहरे मेरा बसेरा न था ,
जहां सब ठहरे मेरा बसेरा न था ,
युही चलता गया मै भी किस सोच में,
सब छूट गए मेरे इस दौर में,
सब छूट गए मेरे इस दौर में,
मुश्किलो से मेरा सामना हुआ है अभी,
मै जब लड़ा वो वक्त कुछ और था ,
मै जब लड़ा वो वक्त कुछ और था ,
सोच और शहर बदलने है मैंने,
सूरत बदलती देख रहा हूं,
सूरत बदलती देख रहा हूं,
बद्लुगा इस बदलती तस्वीर को एक दिन ,
इसलिए खुद को बदलते देख रहा हूं ||
Note - इस कविता से जुड़े सर्वाधिकार रवि प्रताप सिंह के पास हैं। बिना उनकी लिखित अनुमति के कविता के किसी भी हिस्से को उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इस लेख के किसी भी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किये जाने पर क़ानूनी कार्यवायी होगी।

1 comment:
Great sir ji
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