आजकल हम बिहार के चुनावी
मौसम से घिरे हुए है। जिसका असर पुरे देश पर पड़ेगा। वही कुछ दलों के लिए ये शाख
बचाने का मौका है तो कुछ के लिए अपनी लाज बचाने का मौका है। सभी पार्टिययो के अंदर
एक अजीब डर है तो कुछ मीम (मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) जैसी पार्टिया अपनी राजनेतिक
जमींन के लिए आ रही है।
पर एक बात तो पक्की है के
भारत जैसे देश को अभी काफी समय लगेगा अपनी जातिवादी विचारधारा से बहार निकलने में।
चाहे हम कितनी ही विकास की बात करले लेकिन चुनाव के मौसम में जातिवादी केचुए बाहर
निकल ही आते है। हलाकि ये हम सब को पता है के केचुए कहाँ से आते हैं, लेकिन
निश्चित रूप से उनका पता लगाना मुश्किल होता है। पर इन सब के बीच में एक अच्छी बात
ये है कि आज सभी पार्टिया विकास को एक अहम चुनावी मुददा मान रही है, लेकिन आंतरिक
रूप से वह अब भी जाति, धर्म के खेल में फंसी हुई है। तो कुछ को बोलने के लिए एक ही
रटा – रटाया शब्द है जो हर चुनावी मौसम में इसका ढोल पिटते है। यह शब्द है “साम्प्रदायिकता”
और यह शब्द अपने साथ अपने छोटे छोटे भाई – बहनों के साथ आता है जैसे “हिन्दू” , “मुस्लिम”,
कट्टरवाद, देश को खतरा, “दुर्भाग्यपूर्ण”। कोई इन सबसे पूछे क्या है ये सब ? आप 5
साल , 10 साल , 15 साल सत्ता में रहते है और चुनाव के समय जनता को अपनी उप्लब्दिया
बताने के स्थान पर, उनको जातिवाद धर्म और साम्प्रदायिकता में उलझा के रखना चाहते हो
और कुछ नेताओ की तो बेशर्मी देखिये सजा हो चूकी है घोटाले में, और दुसरो को नसीहत
देते फिरते है, और हमारे पत्रकार भाइयो की तो और भी मौज है जैसे बरसात के मौसम में
मेढको के लिए हर जगह अनुकूल हो जाती है, कही भागना नहीं पड़ता, चारो तरफ उनके
अनुकूलता होती है और 50 तरह की टर – टर और करने लग जाते है, पर उनसे यह नहीं पूछ
सकते कि नेता साहब आप जो ये सिद्धांत की
राजनिति की बात करते है, आप तो खुद दोषी है भ्रस्टाचार के, जंगल राज के, चारा घोटाले
के, आज जो आप भाषण दे रहे है, सिद्धांत की राजनिति का, सुशासन का | जब आप सत्ता
में थे तब क्या किया, और तो और कोई उनसे पूछे जब जनता ने उन्हें पूरी तरह से नकार
दिया है और अपनी राजनेतिक जमींन छोटी पड़ रही है तो सब लोग एक ही मंच पे आ गये अपनी
राजनेतिक जमींन तलाश करने के लिए, जो कल तक एक दुसरे को कोसने में सभी मर्यादा तक
भूल गए थे। एक कहावत को इन्होने चरितार्थ कर दिया कठिन समय में “मरता क्या ना करता”
वैसे एक कहावत और थी लेकिन शब्दों की मर्यादा रखते हुए मै अपने आप को रोक गया लेकिन वो शब्द थे “गधे को ............... पड़ता
हैं”।
पर मै यह पूछता हूँ इनसे,
क्या ये बेशर्मी नहीं है ? और तो और इस देश में कोई पटेलो के नाम पर, कोई
मुसलमानों के नाम पर, हिन्दुओ के नाम पर खड़ा हो जाता है, तो कोई सरदारों के नाम
पर, हद तो तब हो जाती है। जब इन्हें पत्रकार नेता कहता है, किसके नेता भाई,
संप्रदाय के, जाति के, धर्म के। क्या ये साप्रदायिकता नहीं है ? क्या केवल अपने आप
को हिन्दू कहना ही साप्रदायिकता है ? भाई देश का नेता कहाँ है ? जो देश के बारे
में सोचे, फिर हम कहते है देश में साप्रदायिकता हैं, इस बारे में एक बार जरुर सोचना
चाहिए कि जो आज हमे हमारी जाति, धर्म के नाम पर एक कर रहा है कल वह अपने लिए हम से
अलग हो जाएगा। हमे नेता उसे कहना चाहिए जो हमे देश के लिए एक करे। अरे भाई ये तो
साधारण सा तर्क है कि अगर देश का भला होगा तो हमारा तो अपने आप हो जाएगा, पर आज के
संदर्भ में देश रूपी नाव में बैठे सब लोग, आपस में एक-दुसरे से आगे निकलने की सोच रहे है, पर हमारी देश की नाव वही के वही खड़ी है। और जो उस नाव
में है वे सब भी कही नहीं पहुच रहे। क्यों न मिल कर नाव को आगे बढाया
जाए। पर देखा जाए तो गलती हम सबकी है। हम लोग इन सबको इतना बढ़ावा देते है। हममेसे
कितने लोग जाति, धर्म को छोड़कर देश के लिए इकट्ठा होते है। हमारा देश प्रेम तो 26 जनवरी और 15 अगस्त को ही
बाहर आता है। सोचना तो पड़ेगा हम सबको के जिसे हम चुन रहे है वो नेता है या अभिनेता
जो सार्वजानिक जीवन में अभिनय करता है, सच्चाई का , ईमानदारी का। नेता कोई बाहर से नहीं आता हम में से ही बनता
है।
चलो एक बार फिर आपको बिहार के
चुनाव की और ले चलू। अगर यहाँ दलों की संख्या की देखे तो आप हैरान हो जाएगे 1866
जो कि 24 जुलाई 2015 तक का आंकड़ा है | आगे और बढ़ सकते है | जिनमे से 56 रास्ट्रीय
और राज्यस्तरीय मान्यता प्राप्त है। इतने चुनावी दलों की संख्या देख कर लगता है कि
क्या ये वास्तव में चुनाव जितने के लिए लड़ते है ? या फिर अपना जन आधार बढाने के
लिए लड़े है। तो सत्य यह है कि ये सब अपना जन आधार तो बढ़ाना चाहते है पर दुसरे का
चुनावी समीकरण बिगाड़ कर और ये जीतने के लिए तो बिलकुल नहीं लड़ते ।
बिहार चुनाव की एक और रोचक
घटना है, और वह है कि आजकल यहाँ जुत्ता – चप्पल चुनाव लड़ रहे है। नहीं साहब ये
चुनावी पार्टियों के चुनावी चिन्ह है। यह सुनकर आप हैरान भी होंगे और हँसेगे भी कि
क्या ये भी चुनावी पार्टियों के नाम या निशान हो सकते है। जैसे : आप पार्टी, हम
पार्टी, साथी पार्टी, मैप पार्टी ऑफ़ इंडिया और निशान है, जिनमे फूलगोभी, टेलीफोन, आइसक्रीम, बाल्टी, जुत्ता,
चप्पल आदि। तो भाइयो, हलाकि मै यहाँ नेताओ जैसा संबोधन कर रहा हूँ। तो आप असमंजस
में ना पडियेगा क्योकि मै कोई नेता नहीं हूँ, पर आप से अपील करना चाहता हूँ कि देश
के नाम पर वोट दे, जाति, धर्म के नाम पर नहीं और उसे चुने जो देश का नेता हो, पार्टी
का नहीं और जो देश को सर्वोपरि रखे, पार्टी को नहीं क्योकि समस्या वही से शुरू
होती है |


2 comments:
Great job....
Thank you
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