Wednesday, 14 October 2015

हिंदुस्तान में हिन्दुओ के साथ दोहरा रवैया.......


दादरी हत्या कांड ने देश में ही नहीं विदेशो में भी काफी सुर्खियां बटोरी, जो घटना घटी उसे किसी भी सूरत में सही नहीं ठराया जा सकता इस में कोई दोराय नहीं है। इस हत्या काण्ड के ऊपर काफी लिखा गया और टीवी डिबेट की भरमार हो गई लगता था, जैसे देश में सभी मुद्दे इस घटना के आगे गोण हो गए हैं और हमारे देश में बस एक यही घटना एेसी हुई है, जो दुनिया के किसी मुल्क में नहीं हुई। टीवी चेंनलो पर बुद्धि जीवी आकर अपने आपको सेकुलरिज्म का सबसे बड़ा रक्षक बताने और इस “कौन बनेगा सबसे बड़ा सेक्युलर” के खेल में विजयी होने के गम्भीर प्रयास को दिखाने का मौका वह छोड़ना नहीं चाह रहे थे। और कोई-कोई तो अपने को सेक्युलर दिखने के चक्कर में हिन्दू कट्टरवाद, भगवा आतंकवाद का बखूबी इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि पूरी दुनिया में 99.9% आतंकवादी घटनाए हो रही है और इन को करने वाले किस धर्म के ये भी सभी जानते है। पर तब धर्म का न कोई रंग होता है न मजहब, ये सोचने वाली बात है।
और किसी ने तो यंहा तक कह दिया जो इस घटना का सबसे बड़ा कारण बनी कि ये गाय किसी की माता नहीं है, इसे तो मै भी खाता हूँ, ये सिर्फ एक जानवर है। और लालू प्रसाद जैसे नेता ने तो अपने विचारधारा से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया “उन्होंने कहा–क्या हुआ अगर किसी ने गाय काट कर खाई है, तो क्या हिन्दू नहीं खाते ? उनके इस महान ज्ञान से मिडिया इतनी प्रभावित हुई कि उनसे इस बारे में सवाल नहीं पूछे, के लालू जी इस बयान से हिन्दुओं की धार्मिक भावनाए आहात हुई है। आपने ये क्यों कहा ? एक और कमाल की बात तो देखिये जम्मू कश्मीर में निर्दलीय MLA इंजीनियर रशीद की किसी बीजेपी MLA ने पिटाई कर दी, क्यों भाई अगर राशिद जी आपको चिड़ा चिडा कर दिखा-दिखा कर बीफ पार्टी दे रहे थे, तो आपको इस में क्या परेशानी है ? अगर बीफ पार्टी से आपकी धार्मिक भावनाए आहत हो रही है, तो इसमें इंजीनियर राशिद की क्या गलती है। ये जो सेकुलरिज्म का ठेका है। ये तो सब बहुसंख्यक समाज ( हिन्दुओ ) ने ले रखा है। अगर वह आपको चिड़ाते है तो भी आपको कुछ लेना देना नहीं है। और इसके बाद उमर अब्दुल्ला जी, जो पूर्व मुख्यमंत्री रह है चुके जम्मू कश्मीर के, उन्होंने क्या कहा वो भी देखे “जम्मू ओर कश्मीर में मुस्लिम बहुसंख्यक है, तो वो जो खाए, जैसा खाय जो करे ये उनका अपना धार्मिक मामला है। आप हिन्दुओ का इसमें बोलने का कोई हक नहीं है और उनका धर्म उन्हें इसकी इजाजत भी देता है” बहुत सही कहा उन्होंने की उनका धर्म उन्हें इसकी इजाजत देता है। अगर हिन्दुओ का धर्म और मान्यताए कुछ कहती है तो उसे मानने और साप्रदायिक सोहार्द का ठेका किसी और का नहीं है |

आज डिबेट इस पर क्यों नहीं हो रही है? कि यह हिन्दुओ की आस्था और धर्म का मामला है, तो किसी को खुलेआम बीफ पार्टी नहीं देनी चाहिए और हिन्दुओ की आस्थाओ पर चोट करने वाले बायांन नहीं देने चाहिए। पर इसके विपरीत बार बार हिन्दुओ की आस्थाओ पर चोट करने वाले बयान की भरमार है | अब बिहार के रास्ट्रीय जनता दल ( RJD ) के नेता रघुवंश प्रसाद सिंह का बयान कि ऋषि-मुनि भी गाय का मांस खाते थे। ये हिन्दुओ की आस्थाओ पर खुले आम चोट करना है। और उन्हें भड़काने का काम कर रहा है इस दोहरे मापदण्ड से हिन्दू समाज का एक बड़ा दबका अब गुस्से में है। खास कर युवा पीढ़ी, जब वो देखते है कि एक पोशाक पहनने पर पुरे पंजाब में क़ानून व्यवस्था चरमरा गई थी, तब किसी ने सवाल नहीं किया। आज भी ये मामला ठंडा नहीं पड़ा है। शाहबानो केस में एक समुदाय को खुश करने के लिए क़ानून तक बदल दिया जाता है, तब कोई कुछ नहीं बोलता वो साप्रदायिकता नही है। जबकि हमारा सविधान भी धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ है। जब एक मूवी ( गुलाम-ए-मुस्तफा ) का सिर्फ नाम रखने पर बवाल मच जाता है। तब कोई अभिव्यक्ति की आजादी पर बोलने वाले कहाँ जाते है। जब  एक कार्टून बनाने पर लोगो की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। तब कोई कुछ नहीं बोलता लेकिन हिन्दु देवी देवताओ की नग्न तस्वीर बनायीं जाती तो उसका सभ्य तरीके से विरोध को भी सप्रद्यिक कहा जाता है। इस तरीके के दोहरे मापदण्ड से हिन्दू समाज में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। और यही सब हिन्दुओ को कट्टर होने पर मजबूर कर रहा है।



बहुसंख्यक समाज के में गुस्से की भावना दिन ब दिन बढती जा रही है कि कोई भी कही भी उठकर उनकी धार्मिक भावनाओ पर आघात करता है। और जब इस पर सवाल उठाए जाते है तो उन्हें कट्टर और सांप्रदायिक कह दिया जाता है। और अपनी बातों को सही ठहराने के लिए कुतर्को का सहारा लिया जाता है। आज ऐसा लगता कि हिन्दू हिंदुस्तान में ही अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर पा रहा है। इनकी सहनशीलता ही इनके लिए घातक सिद्ध हो रही है। क्या हो जाता उन सेक्युलर लोगो को ? जब कोई मोहम्मद साहब की तस्वीर बनाता है। तो उस तस्वीर बनाने के खिलाफ फतवे निकल जाते उसके सर की कीमत लगाई जाती है। तब इसी मिडिया और सेक्युलर लोगो के पेट में दर्द क्यों नहीं होता? जब कोई रामायण महाभारत को काल्पनिक कहता है। तब मिडिया भी सवाल नहीं उठाती क्या सारे सेक्युलर सवाल जवाब केवल हिन्दुओ के लिए है। हिन्दुओ सहनशील है इसलिए उन पर कुछ भी बोलना यंहा तक की भारत माता को डायन कहना सब चलता है क्योकि वह पलट कर वार नहीं करते। पर जो अब नहीं पीढ़ी आ रही है वह पहले से कम सहनशील और जल्दी प्रतिकिरिया देती है उसी का परिणाम ये दादरी की घटना है। अगर जल्दी यह दोहरा रवैया नहीं रुका तो आने वाले समय में इसका खामियाजा देश और समाज को उठाना पड़ेगा और गृहयुद्ध के हालत बन जायेगे।      

#क्या समाज में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दे रहा है मीडिया ?