दादरी की घटना सभी को याद होगी और होनी भी चाहिए क्योकि की इसका श्रेय हमारे
मीडिया को बखूबी जाता है लेकिन एक घटना
जिस पर ज्यादा लोगो का धयान नहीं गया या ये भी कह सकते है की मीडिया ने इस पर धयान
नहीं दिया और इसे दादरी की तरह अंतर्राष्ट्रीय घटना बनने से बचा लिया और एक
कदम आगे बढकर इस घटना को राष्ट्रिय घटना भी नहीं बनने दिया। आगे बढ़ने से पहले मै
दादरी घटना की कुछ खास बाते सामने रखना चाहता हूँ।
इस घटना में मरने वाले अख़लाक़ के परिवार को 45 लाख रूपये हर्जाने के रूप में
मिले और उसके दो भाइयो को भी 5-5 लाख रूपये मिले जबकि भाइयो का बाल भी बांका नहीं
हुआ। अखलाक का पुत्र पहले से ही एयर फाॅर्स में है तो एयर फाॅर्स ने
भी मदद को आगे हाथ बढ़ाये, जो की अच्छा और सकारात्मक कदम हैं। कुछ नेताओ ने इसे सांप्रदायिक
घटना बताया तो कुछ नेता राजनीतिक फायदा लेने के प्रयास में दिल्ली और हैदराबाद छोड़
कर यंहा आकर रोना रोने लगे जैसे उनके शहर में रामराज्य है।
अब बात करते है उस घटना की जिसे मीडिया में नहीं दिखाया गया। यह घटना है
कन्नौज में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के समय की, जब मूर्ति विसर्जन के लिए जा रहा
जुलुस चूड़ी वाली गली के पास पंहुचा तो वहां मौजूद मुस्लिम युवक पर गुलाल गिर गया। इसी बात पर मुस्लिम यूवको ने झगडा शुरू कर दिया। कुछ अन्य मुस्लिम युवक भी उसकी
सहायता के लिए आगे आ गए, फिर उन मुस्लिम युवको ने छत पर जाकर जुलूस पर गोलियां चला
दी। इसमें महेश कुशवाहा और अपूर्व गुप्ता गोली लगने
से घायल हो गए। महेश कुशवाहा को अस्पताल ले जाते हुए मौत हो गयी। ये खबर राष्टीय मीडिया का ध्यान अपनी और नहीं खींच पाई। राज्य सरकार ने महेश को 10 लाख रूपये के
मुआवजा का ऐलान कर दिया। यंहा भी इस
हिन्दू युवक के साथ दौहरा रवैया अपनाया गया। ये एक गरीब रेहड़ी वाला था। क्या उसको
इतना कम हर्जाना इसलिए मिला की वह हिन्दू युवक था ? क्यों राज्य सरकार ने इस युवक को भी
45 लाख नहीं दिए ? जब मोहम्मद अख़लाक़ के भाइयो को बिना किसी ठोस कारण के 5-5 लाख
रूपये दिए जा सकते है तो इस युवक के घरवालो को इतना कम हर्जाना क्यों ?
जो नेता दादरी की घटना को साप्रदायिक बताते हैं वो पहले यह जान ले कि बिसारा में हिन्दू आबादी अधिक है और मुस्लिमो के कुछ गिने चुने ही घर है। अगर यह साम्प्रदायिक घटना होती तो केवल अख़लाक़ ही नहीं मारा जाता बल्कि दुसरे मुस्लिम परिवारों की भी जान-माल की हानि होती। मगर ऐसा नहीं हुआ। इसका मतलब ये साम्प्रदायिक घटना नहीं थी। पुलिस को बुलाने वाले भी हिन्दू ही थे इसलिए इसे साम्प्रदायिक घटना कहना सरासर गलत हैं। वहां के कुछ ग्रामीण तो यह भी कहते हैं कि दानिश ( अख़लाक़ का छोटा बेटा ) का झगडा, वंहा के ही हिन्दू लडको के साथ हो गया था। दानिश ने चुनोती दी थी कि वह गो मांस खाएगा इदुल अजहा के दिन। लेकिन ऐसा हो न सका क्योकि गाँव के लडको ने उस दिन गाँव की घेरे बंदी कर दी थी ताकि कोई बीफ न ला पाए और न काट पाए। इदुल अजहा के कुछ दिनों के बाद, जब लडको को यह पता चला के गाँव में उसने बीफ खाया है। क्योंकि उन्हें प्लास्टिक की थैली में हड्डियाँ मिली तो उसके बाद ही यह सब घटनाक्रम हुआ। ये भी एक थ्योरी है जो अभी भी उत्तर प्रदेश के लोगो की जबान पर है।
जो नेता दादरी की घटना को साप्रदायिक बताते हैं वो पहले यह जान ले कि बिसारा में हिन्दू आबादी अधिक है और मुस्लिमो के कुछ गिने चुने ही घर है। अगर यह साम्प्रदायिक घटना होती तो केवल अख़लाक़ ही नहीं मारा जाता बल्कि दुसरे मुस्लिम परिवारों की भी जान-माल की हानि होती। मगर ऐसा नहीं हुआ। इसका मतलब ये साम्प्रदायिक घटना नहीं थी। पुलिस को बुलाने वाले भी हिन्दू ही थे इसलिए इसे साम्प्रदायिक घटना कहना सरासर गलत हैं। वहां के कुछ ग्रामीण तो यह भी कहते हैं कि दानिश ( अख़लाक़ का छोटा बेटा ) का झगडा, वंहा के ही हिन्दू लडको के साथ हो गया था। दानिश ने चुनोती दी थी कि वह गो मांस खाएगा इदुल अजहा के दिन। लेकिन ऐसा हो न सका क्योकि गाँव के लडको ने उस दिन गाँव की घेरे बंदी कर दी थी ताकि कोई बीफ न ला पाए और न काट पाए। इदुल अजहा के कुछ दिनों के बाद, जब लडको को यह पता चला के गाँव में उसने बीफ खाया है। क्योंकि उन्हें प्लास्टिक की थैली में हड्डियाँ मिली तो उसके बाद ही यह सब घटनाक्रम हुआ। ये भी एक थ्योरी है जो अभी भी उत्तर प्रदेश के लोगो की जबान पर है।
अंत में, मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि मीडिया अपना काम करे। परन्तु हाँ, अपना ही काम करे, न्यायधीश
बन कर किसी भी खबर पर फैसला सुनाना बंद करे, और खबर में भेदभाव वाला रवैया न अपनाये। आज मीडिया के हाथ में बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते,
क्योकि खबरों के दौहरे रवैया से समाज के लोग भी बट रहे है। जब वह देखते है कि एक
खबर को 20 दिन मुददा बना कर रखा तो दूसरी खबर को 5 मिनट् का कवरेज भी नहीं मिला। कही-कही खबरों को सनसनी खेज बनाने के लिए दलित शब्द जोड दिया जाता हैं। यही
दौहरा रवैया समाज और समुदाय में कट्टरता पैदा कर रहा है। अगर इस तरह की घटनाओ को देखे तो यही
लगता है कि मीडिया भी समाज में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दे रहा है।

4 comments:
i m agree with you ...
we have to save our self frm so called secular...
Superb..........
धन्यवाद..
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